रविवार, 16 मार्च 2014

पत्रकारिता का प्रशिक्षण ही बन गया है पत्रकारिता

                                                         – संजय कुमार बलौदिया

पिछले एक दशक में पत्रकारिता के शिक्षण संस्थानों का तेजी से विस्तार हुआ है। पत्रकारिता के क्षेत्र को जिस तरह ग्लैमर्स की दुनिया बताकर प्रचारित किया जा रहा है। इससे छात्र-छात्राओं का पत्रकारिता की ओर रुझान तेजी से बढ़ा है। इसी वजह से आज कई तरह के मीडिया संस्थान सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और डिग्री कोर्स चल रहे है। ये संस्थान एंकर, रिपोर्टर और कैमरामैन बनाने के लिए सर्टिफिकेट और डिप्लोमा भी बांट रहे हैं। पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और बदलती तकनीक के कारण ही इस क्षेत्र में प्रशिक्षण को जरूरी समझा गया। प्रशिक्षण का सामान्य अर्थ है कि किसी भी काम को और बेहतर तरीके से करना है। पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रशिक्षण शब्द को सिर्फ तकनीक अर्थों तक ही समेट दिया गया है। इस वजह से ऐसा लगता है कि जैसे पत्रकारिता का प्रशिक्षण ही पत्रकारिता है। 

अभी हाल ही में विश्व पुस्तक मेले के दौरान पत्रकारिता के कुछ छात्र-छात्राओं और अध्यापकों को देखा जो मीडिया लेखन, समाचार लेखन, रेडियो लेखन जैसी किताबें खोज रहे थे। उन्हें काफी समझाने की कोशिश की इस प्रकार की किताबों से पहले पत्रकारिता को लेकर एक समझ बनाने की जरूरत है। लेकिन शायद वह समझना ही नहीं चाहते थे और वह इन किताबों को खोजते हुए आगे बढ़ गए। 

दरअसल बात यह है कि बीते एक दशक में जिस तरह से पत्रकारिता के क्षेत्र को प्रचारित किया गया है। उससे अब छात्र-छात्राओं को पत्रकारिता का प्रशिक्षण/पाठ्यक्रम ही पत्रकारिता लगने लगा है और वह पाठ्यक्रम की किताबें पढ़कर ही पत्रकारिता कर लेना चाहते है। ये छात्र-छात्राएं खबरों को जानना-पहचानना और खोज नहीं चाहते हैं। इनके अध्यापक भी सिर्फ छात्र-छात्राओं को इतना ही तो सिखाना चाहते है कि समाचार कैसे लिखे, रेडियो के लिए कैसे लिखे, पैकेज कैसे काटें, एकरिंग कैसे करें या फिर रिपोर्टिंग संबंधी कुछ जानकारी भी दे देते हैं। इससे ज्यादा हुआ तो टाइपिंग और पेज डिजाइनिंग सीखा दी जाती है। इसके बाद वह एक पत्रकार बन जाता है और किसी मीडिया संस्थान में 5 डब्ल्यू 1 एच का प्रयोग करते हुए खबरें लिखता रहता है या पैकेज काटता रहता है। वह इस फार्मूले से आगे बढ़कर खबर की पहचान नहीं कर पाता है और ना ही किसी प्रकार का प्रयोग कर पाता है।  

पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रशिक्षित पत्रकार को तकनीकी प्रशिक्षण तो मिल जाता है, लेकिन इस पेशे के लिए जो  सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समझ बननी चाहिए, वह नहीं बन पाती है। जिससे आज के पत्रकार सामाजिक सरोकारों से दूर होते नजर आते हैं। तकनीक प्रशिक्षण के महत्व को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन इसके दूसरे पक्ष को अनदेखा करना भी सही नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह पत्रकारिता के सभी संस्थानों का एक जैसा पाठ्यक्रम/प्रशिक्षण है और बाजार का दबाव भी है। जिस वजह से आज इस तरह के पत्रकार तैयार किये जा रहे हैं। पत्रकारिता को चाहकर भी पाठ्यक्रम के दायरे नहीं समेटा जा सकता। लेकिन अब स्थिति ऐसी हो गई कि पत्रकारिता के प्रशिक्षण/पाठ्यक्रम को ही पत्रकारिता समझा जाने लगा है। इससे कहीं न कहीं पत्रकारिता लेखन सिमटता नजर आ रहा है। पत्रकारिता जैसे क्षेत्र के लिए यह स्थिति बहुत खतरनाक है। यह स्थिति आगे आने वाली पत्रकार पीढ़ी के लिए बेहद खतरनाक होगी। 










किशोर और नए लोगों की अपराधों में बढ़ रही है संलिप्तता

                                                                       -संजय कुमार बलौदिया
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने कुछ समय पहले ही आंकड़े जारी किए। जिसके अनुसार दिल्ली में पिछले साल 2012 के मुकाबले 2013 में 43.67 फीसदी अपराधिक मामलों में बढ़ोत्तरी हुई हैं। बढ़ते अपराधिक मामले चिंता का विषय है। इन्हीं आंकड़ों में यह भी बताया गया है कि दिल्ली में 2012 के मुकाबले 2013 में हत्या के मामलों में कमी आई है। 2012 में 504 हत्याएं हुई जबकि 2013 में 487 हत्याएं हुई। भले ही हत्या संबंधी मामलों में कमी आई हो, लेकिन 2013 में हत्या जैसे मामलों को अंजाम देने वाले लोगों में 96 फीसदी लोग पहली बार अपराध करने वाले हैं। जिसमें सिर्फ 1.5 लोग ही ऐसे है जिनका पहले अपराधिक रिकॉर्ड रहा है। अपराध के बढ़ते आंकड़ों से ज्यादा चिंताजनक यह है कि कैसे लोगों में हिंसक प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती जा रही हैं।

वहीं दिल्ली में 2012 में 680 बलात्कार की घटनाएं हुई जबकि 2013 में बलात्कार की घटनाओं का यह आंकड़ा बढ़कर 1559 हो गया है। 2012 में 62 किशोरों को बलात्कार के मामलों में और हत्या के मामलों में 97 किशोरों को गिरफ्तार किया गया। एनसीआरबी के आंकड़ो के अनुसार 2012 में भारतीय दंड संहिता के तहत अपराधों के आरोपों में 18 साल से कम आयु के 35465 किशोर गिरफ्तार किए गए। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक ही 2002 में बलात्कार मामले में 485 किशोर संलिप्त थे जबकि 2012 में यह आंकड़ा बढ़कर 1,175 हो गया। ठीक इसी प्रकार 2002 में हत्या के मामले में 531 किशोरों को गिरफ्तार किया गया, जबकि 2012 में यह आंकड़ा बढ़कर 990 हो गया है। इसी प्रकार अन्य अपराधों में भी किशोरों की संलिप्तता बढ़ती जा रही है।

एनसीआरबी के आंकड़ों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि किशोरों की अपराधों में संलिप्तता तेजी से बढ़ती जा रही है। वहीं नए लोगों द्वारा हत्या जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम देने के मामलों में भी बढ़ोतरी हो रही है। हमें अब अपराध के आंकड़ों को कम करने के साथ-साथ यह भी सोचना होगा कि किशोरों व नये लोगों की अपराधों में संलिप्तता को कैसे रोका जाए।

एक रिपोर्ट के मुताबिक कई बार किशोर, अपराध गुस्से के कारण या बदला लेने के लिए करते हैं और कई बार तो फिल्मों में देखे गए दृश्यों की नकल करने के लिए भी करते हैं। किशोरों को पारिवारिक वातावरण और उनके आसपास की परिस्थितियां ही उसे अच्छा या बुरा नागरिक बनाती है। वहीं अकेलापन और उपेक्षा किशोरों को अपराधिकता की ओर धकेलती है। अकेलापन किशोरों को क्रूर बनाता है। जिससे वह नशा करने और अपराधिक गतिविधियों में संलिप्त होने लगते है। इन वजहों से भी आज किशोरों और नए लोगों की बलात्कार, हत्या जैसे जघन्य अपराधों में संलिप्तता बढ़ती जा रही है।

आमतौर पर कहा जाता है कि निम्न आर्थिक वर्ग से संबंधित किशोर और लोग ही अपराधों को अंजाम देते है। यह बात एक हद सही हो सकती है। लेकिन यह भी सच है कि अब पढ़े-लिखे किशोर और नए लोग भी अपराधों को अंजाम देने में पीछे नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि आज के माता-पिता भौतिकता और महत्वकांक्षा की अंधी दौड़ में लगे हुए हैं, जिससे वह अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं। जिससे बच्चों को सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता है। जिससे युवा भटक जाते है। आज के प्रतिस्पर्धा के युग में युवा भी ढेर सारी भौतिक सुख-सुविधाओं को पाने की अंधी दौड़ में लगे हुए है। वह इन सुख-सुविधाओं को पाने के लिए अपराध की दुनिया की ओर भी आकर्षित हो रहे हैं। अपराधों के बढ़ने का एक कारण अपराधी को दण्डित किये जाने और न्याय सुलभता की दर का नीचे गिरना भी है।

किसी भी कानून से अपराधों को कम तो किया जा सकता है लेकिन खत्म नहीं किया जा सकता। आपराधिक मानसिकता को कानून के जरिए खत्म नहीं किया जा सकता। हमें किशोरों को स्वस्थ व सुंदर समाज देना होगा, तभी वह अपराधिक मानसिकता से मुक्त हो पाएंगे।



मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

सुंदरता के बाजार ने बढ़ाई लोगों में सुंदर बनने की चाह

                                                  -संजय कुमार बलौदिया
पिछले दिनों द इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ एस्थेटिक प्लास्टिक सर्जरी का सर्वे प्रकाशित हुआ जिसके मुताबिक कॉस्मेटिक सर्जरी के मामले में अमेरिका, चीन और ब्राजील के बाद भारत चौथे स्थान पर आता है। यह आंकड़ा भारत की कुल आबादी पर आधारित है। सोशल न्यूज नेटवर्क वोकेटिव के अनुसार सर्जरी का बड़ा कारण सोशल साइट पर दूसरों से ज्यादा बेहतर दिखने की होड़ को बताया गया है। प्लास्टिक सर्जरी करवाने वालों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। अब लोग सिर्फ इसलिए सर्जरी करवाने लगे है कि उन्हें फेसबुक पर सुंदर दिखना है। सोशल साइट्स पर ज्यादा दोस्त बनाने के लिए और ज्यादा लाइक पाने के लिए भी लोग सुंदर दिखना चाहते है। इस बात से समझा जा सकता है कि पिछले एक दशक में कैसे सुंदरता को लोगों के बीच प्रचारित किया गया है और सुंदरता के मायने बदल दिये गये है। पूंजीवादी व्यवस्था में महिला के शरीर और उसकी सुंदरता को बाजार में बेचने वाले उत्पाद के तौर पर पेश किया जाता है। पहले लोगों के लिए सुंदरता व्यक्ति के व्यक्तित्व से होती थी। लेकिन अब लोगों के लिए सुंदरता के मायने सिर्फ आकर्षक दिखने और जवान दिखने तक सिमट कर रह गए है। सुंदर दिखने की इच्छा हर व्यक्ति की होती है, लेकिन सिर्फ बाहरी सुंदरता को ही सुंदरता मान लेना कितना सही है।

दरअसल सवाल यह है कि लोगों के सुंदर दिखने की चाह को बाजार ने कैसे भुनाया और बढ़ाया है। आज अलग-अलग ब्रांड की हजारों तरह की क्रीमों से बाजार अटे पड़े है। कई कंपनियों ने तो उम्र और स्किन के हिसाब से अलग-अलग फेशियल भी लॉन्च किए है। रोज कोई न कोई नया ब्रांड सुंदर दिखने की क्रीम लांच कर रहा है। पहले महिलाओं के लिए ही सुंदर दिखने की क्रीम और फेसियल उपलब्ध थे, लेकिन आज कई कम्पनियां पुरुषों को भी सुंदर बनाने काम में जुट गई है और पुरुषों के लिए भी कई तरह की क्रीम्स मार्केट में उपलब्ध है। अब इसके एक कदम आगे बढ़कर तकनीक के जरिए लोगों को सुंदर बनाने की कोशिश की जा रही है। यह तकनीक कॉस्मेटिक सर्जरी है। कॉस्मेटिक सर्जरी को त्वचा में कसाव लाने के लिए किया जाता है। पहले जो कास्मेटिक सर्जरी गम्भीर चोट के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाती थी, वही सर्जरी आज लोगों को मनचाहा रूप दे रही है। यह प्रोडक्ट्स या सर्जरी लोगों को यह विश्वास दिलाते है कि उनकी बढ़ती उम्र में भी वह पहले की तरह आकर्षक और जवान दिखेंगे और इन प्रोडक्ट्स से उनका जीवन, कैरियर और संभावनाएं खिल उठेंगी। जबकि इन प्रोडक्ट्स या सर्जरी से लोगों के दिखने में कोई खास अंतर नहीं आता है, लेकिन उसके बावजूद भी लोग इस सुंदरता को पाने होड़ में लगे रहते है।  जिससे आज मार्केट में लोगों को सुंदर बनाने के लिए अलग-अलग तरह की क्रीमों से लेकर कई तरह के सर्जरी पैकेज भी उपलब्ध है।  

एक खबर के मुताबिक देश में सौंदर्य प्रसाधनों का कारोबार साल 2012-13 में 10,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गया। विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2007 से अब तक राइनोप्लास्टी ( नाक की सर्जरी) के मामलों में 2400 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है। कॉस्मेटिक सर्जरी का व्यापार अरबों डॉलर के आंकड़े पर पहुंच चुका है। आज स्त्री सुंदरता के संदर्भ में स्त्री के स्तन, उसकी कमर और उसके नितंबों का एक खास साइज होना चाहिए, जो बाजार के बनाए मानक के अनुसार हो, अन्यथा वह स्त्री सुंदर नहीं कही जाएगी। स्त्री की इसी छवि को विज्ञापनों के जरिए खूब प्रचारित किया जा रहा है। इसके पीछे कॉस्मेटिक इंडस्ट्री और हेल्थ इंडस्ट्री की भी अहम भूमिका है।

प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक में कई तरह की सुंदर बनाने वाली क्रीमों या सर्जरी के विज्ञापन बखूबी देखने को मिल जाते है। इनके अलावा अब समाचारपत्रों में एक पेज पर सुंदरता को लेकर कई तरह की फीचर स्टोरी भी दी जाती है जिसमें यह बताया जाता है कि कैसे क्रीम्स या सर्जरी से सुंदर बना जा सकता है और प्रकृति उपायों द्वारा भी सुंदर बनने के बारे में बताया जाता है। इसके अलावा सर्जरी को करवाने के खर्च से लेकर उन संस्थानों तक की जानकारी भी दी जाती है। इस प्रकार देखा जा सकता है कि किस तरह से मीडिया भी बाजार द्वारा बनाई गई सुदंरता को खूब प्रचारित-प्रसारित कर रहा है। जिससे अब लोगों के लिए सबसे जरूरी सुंदर दिखना हो गया है। कैरियर, पदोन्नति, दोस्तों की संख्या बढ़ाने या लाइक पाने के लिए और आत्मविश्वास पाने के लिए भी सुंदर दिखना जरूरी है। कुल मिलाकर बाजार की सुंदरता के मानदंडों से ही आप स्वयं को सुंदर मान सकते है, वरना नहीं। अब तो लोग जॉब इंटरव्यू और पदोन्नति के लिए भी कॉस्मेटिक सर्जरी करवाने लगे।

पिछले साल एसोसिएशन ऑफ प्लास्टिक सर्जंस ऑफ इंडिया के एक अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों में सीने की सर्जरी ने पिछले 5 साल में 150 फीसदी की बढ़त दर्ज की है। पिछले कुछ सालों में ब्रेस्ट सर्जरी अब बेहद लोकप्रिय कॉस्मेटिक सर्जरी में बन गई है। इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ एस्थेटिक प्लास्टिक सर्जरी सर्वे के मुताबिक, भारत में 2010-11 में 51,000 ब्रेस्ट सर्जरी की गई, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 15 लाख है। इस प्रकार समझ जा सकता है कि भारत में सर्जरी कराने की गलत प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। भले ही कॉस्मेटिक सर्जरी महंगी न हो, लेकिन इसके नुकसानों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अभी हाल ही में जामा प्लास्टिक फेसियल सर्जरी ने अपने एक अध्ययन में कहा है कि चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी से मरीजों के युवा दिखने में सिर्फ तीन साल का अंतर आता है। सर्जरी से पहले मरीजों की उम्र क्रमशः 2.1 साल कम उम्र दिखती और सर्जरी के बाद 5.2 साल अधिक जवान दिखते कुल मिलाकर आकर्षक या जवान दिखने में औसतन सिर्फ 3.1 साल का अंतर आता है।

इस अध्ययन और द इंटरनेशनल सोसायटी आफ एस्थेटिक प्लास्टिक सर्जरी के सर्वे से यह बात साफ हो जाती है कि बाजार की सुंदरता और सुंदरता के लिए होने वाली प्रतियोगिताओं ने लोगों को कैसे प्रभावित किया है। पुरुषों के लिए सुदंरता का मतलब सीना सुस्त होना चाहिए और पेट पर अनचाही चर्बी नहीं होनी चाहिए। महिलाओं के संदर्भ सुंदरता, उनका सीना, उनकी कमर, उनके नितंब और उनका वजन बाजार की सुंदरता के मापदंड के अनुसार होना चाहिए। इस सुंदरता को पाने के लिए लोगों की बीच एक होड़ सी लगी है। इससे वह लोग जो इस प्रकार की सुंदरता हासिल नहीं कर पाते है, वह स्वयं को हीन भावना से देखने लगते हैं। इससे वह स्वयं को सुंदर नहीं मानते है। भले ही यह कहा जाता है कि रंग के आधार पर भेदभाव खत्म हो गया हो, लेकिन सच यह है कि सुंदरता का यह विचार लोगों में एक प्रकार की विषमता को जन्म दे रहा है। जिससे लोगों में कहीं न कहीं इस सुंदरता को पाने की लालसा बढ़ती जा रही है और लोग सुंदरता के इन मापदंडों के अनुसार सुंदर दिखने की होड़ में शामिल होते जा रहे हैं।  

कीमती एक रुपया

                                                                                     -संजय कुमार बलौदिया
अभी कुछ दिन पहले एक प्रदर्शन के दौरान अपने कुछ पुराने दोस्तों से मुलाकात हो गई। तब हम सभी दोस्त नोएडा सेक्टर 16 मेट्रो स्टेशन के पास चाय पीने के लिए जगह ढूंढ रहे थे। तभी हमारा एक दोस्त मेट्रो स्टेशन पर लगे स्टॉल से पानी की बोतल लेने गया। पानी की बोतल की कीमत 18 रुपये थी, लेकिन दुकानदार कह रहा था कि यह बोतल 20 रुपये की है। हमारे दोस्त के ज्यादा बहस करने के बाद दुकानदार कहने लगा कि भईया आप तीन रुपये खुले दे दो। वरना पानी की बोतल 20 रुपये की ही है। तब हमारे मित्र ने वापस आकर खुले तीन रुपये मांगे और जाकर दुकानदार को देकर आया।  कुछ दिन बाद ही एक मेट्रो स्टेशन पर मजदूर टिकट ले रहा था। उसका टिकट 21 रुपये का था। मेट्रो कर्मचारी ने मजदूर से एक रुपया खुला मांगा, लेकिन मजदूर के पास दो रुपये का सिक्का था। मजदूर ने दो रुपये का सिक्का मेट्रो कर्मचारी दे दिया, मेट्रो कर्मचारी ने एक रुपये का सिक्का वापस देने के बजाए कह दिया कि हिसाब हो गया। 

 दरअसल बात यह है कि आज एक या दो रुपये वापस न करना एक चलन सा बन गया है। वहीं हमारे समाज में अगर कोई व्यक्ति बचा हुआ एक रुपया या दो रुपया मांगता है, तो लोग उसे अचरज से देखने लगते है कि वह भला एक या दो रुपये का क्या करेगा। खैर अब बचा हुआ एक रुपया मांगने का झमेला ही खत्म करने का और मुनाफा कमाने का नया रास्ता एक टेलीकॉम कंपनी ने निकाला है। यह बात उस कंपनी के विज्ञापन से समझी जा सकती है। यह विज्ञापन आजकल टीवी चैनलों पर काफी छाया हुआ हैकि एक रुपये के बदले में वीडियो देखे, सिर्फ एक रुपये का ही है। इस विज्ञापन के जरिए कंपनी अपनी एक सेवा का प्रचार कर रही है और एक रुपये की कीमत को भी बखूबी बता रही है। लेकिन यहां एक अहम बात यह है कि एक रुपये की कीमत सिर्फ और सिर्फ वीडियो को देखने के लिए है। वीडियो देखने अलावा एक रुपये से आप और कुछ नहीं कर सकते है।

कुछ समय पहले पच्चीस पैसे, फिर पचास की कीमत खत्म कर दी गई। आज लोग आधुनिक परिवेश में एक या दो रुपये की कीमत कम आंकने लगे है। भला एक या दो रुपये वैसे भी है ही क्या। आजकल बस में, मेट्रो स्टेशन पर या डाकघर में जाइए या फिर कहीं भी, वहां पर भी आपको एक ही जवाब मिलेगा कि एक या दो रुपये खुले नहीं है या फिर खुले पैसे दो। अगर खुले पैसे है तो ठीक वरना एक या दो रुपये छोड़ दो। अब लोगों को अपनी जेबों में कम से कम 25 से 50 रुपये खुले लेकर चलना चाहिए। वरना शाम 10-20 रुपये तो ऐसे ही ठग लिये जाएंगे। ऐसे में अमीर आदमी के लिए एक या दो रुपये कोई मायने नहीं रखते हो, लेकिन किसी गरीब के लिए एक या दो रुपये मायने रखता है। जब कोई अमीर आदमी किसी सेवा को लेने के बाद कहता है कि एक या दो रुपये खुले नहीं है, तो कोई बात नहीं है। वहीं से यह सारी कहानी शुरू होती है। अब जब कोई गरीब उस सेवा का इस्तेमाल करता है, तब वह विक्रेता या दुकानदार उसे भी कहेगा कि एक या दो रुपये खुले नहीं। अगर कोई डाकघर की सेवा ले रहा है, तो बचे हुए एक या दो रुपये मांगने पर डाक  टिकट थामा दिया जाता है।

सूचना क्रांति के दौर में एक रुपये को चुकाने के बदले में नया तरीका वीडियो को दिखाने का इजाद किया गया है। इस वीडियो से भी उपभोक्ता बेचारा पहले की तरह ही ठगा जाएगा, लेकिन उसे ठगे जाने का एहसास नहीं होने दिया जाएगा। अब अगर कोई उपभोक्ता एक रुपया मांगेगा, तो लोग उसे फट से वीडियो दिखाने लगेंगे। सवाल यह है कि वह उपभोक्ता वीडियो क्यों देखे। दूसरी बात यह है कि अब बाजार या कंपनियां तय कर रही है कि हम कैसे रुपया खर्च करेंगे।

इस एक रुपये की गतिविधि को हम भले ही छोटी या कमतर आंके, लेकिन हकीकत यही है कि इस एक रुपये से ही ठगी का खेल शुरू होता है। पहले एक रुपये, अब दो रुपये, इसके बाद होगा कि पांच रुपये नहीं है। हमारे लिए उस एक रुपये का मतलब न हो, लेकिन यह सोचने वाली बात है कि कैसे एक व्यक्ति से एक, दो रुपये आसानी से खुलेआम लूटे जा रहे है। सबसे मजेदार बात तो यह है कि इस लूट की कोई शिकायत या गुस्सा भी लोग नहीं करते है। अगर यह सोचा जाए कि वह व्यक्ति अगर एकएक रुपया करके शाम तक 100 लोगों को भी एक रुपया वापस नहीं लौटता है, तो शाम तक 100 रुपये हो गए और एक महीने में तीन हजार रुपये हो जाएंगे।

जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक ने बताया कि सरकारी रुपया कैसे भ्रष्टाचार के कारण नीचे तक पहुंचते-पहुंचते दस-पन्द्रह पैसे रह जाता है। लेकिन हम लोग अभी तक रुपये की कीमत को नहीं समझे है। वहीं योजना आयोग ने गरीबी के नए आंकड़े जारी किए है जिसमें गांवों में 27 और शहरों में 33 रुपये से कम कमाने वालों को गरीबों की श्रेणी में रखा है। दो सालों में सरकार ने गांवों और शहरों के लोगों की आमदनी में सिर्फ 1 रुपये की बढ़ोत्तरी की है। अब तो लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि एक रुपया कितना कीमती है।



मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

मंदी और मीडिया

                                                             संजय कुमार बलौदिया
मीडिया संस्थानों में आर्थिक संकट या मंदी के बहाने कर्मचारियों की छंटनी को एक स्वीकृति के रूप में लिया जाता है। 2008 की मंदी2011 का यूरोपीय संकट और 2013 में मंदी के दौर में भारत के कई मीडिया संस्थानों में कर्मचारियों की बड़े पैमाने पर छंटनी की गई। छंटनी का अर्थ उन्हें काम से बाहर करना है और उन्हें दी जाने वाली महावार राशि और कानूनी सुविधाओं पर खर्च होनी वाली राशि को मीडिया संस्थानों द्वारा बचाना है। 2013 की मंदी के हालात में दो तरह की स्थितियां सामने आई। कई मीडिया संस्थानों ने अपने चैनलसमाचार पत्रसमाचार पत्रों के नये संस्करण शुरू किए। दूसरी तरफ कई मीडिया संस्थानों में कर्मचारियों की छंटनी की गई। पहला प्रश्न है कि क्या मंदी मीडिया संस्थानों में कुछ खास संस्थानों को प्रभावित करता है दूसरा मंदी के हालात के दावे के बावजूद मीडिया संस्थान अपने विस्तार या दूसरे उद्योग धंधे में सक्रिय संस्थान मीडिया संस्थान स्थापित करने का फैसला क्यों करते हैंक्या छंटनी का फैसला किसी मीडिया कंपनी के वार्षिक आय-व्यय के ब्यौरे में नुकसान के आने की वजह से किया जाता है या नुकसान की आशंका के मद्देनजर किया जाता हैनेटवर्क -18 कंपनी ने आर्थिक स्थिति ठीक न होने का तर्क देकर छंटनी की ( नमूना तालिका देखें) जबकि वित्त वर्ष 2012-13 में टीवी 18 समूह को 165 करोड़ का सकल लाभ हुआ और बीते वर्ष में यह लाभ 75.9 करोड़ रुपये का था। हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड को 2013 की दूसरी तिमाही शुद्ध लाभ 24.91 करोड़ रुपये हुआ। टाइम्स ऑफ इंडियाहिन्दुस्तान टाइम्स और दूसरे जितने समूहों ने 2013 से पहले के कुछेक वर्षों में जितने कर्मचारियों की छंटनी की है उनके छंटनी के तर्कों और उन कंपनियों को होने वाले लाभ का विश्लेषण किया जा सकता है। टाइम्स ऑफ इंडियाहिन्दुस्तान टाइम्स आदि कंपनियां लगातार भारी मुनाफा कमा रही है।

सीआईआई एवं परामर्श फर्म पीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट के मुताबिक2012 में मनोरंजन एवं मीडिया उद्योग का आकार 96,500 करोड़ रुपये का था जो साल दर साल 20 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। इसी रिपोर्ट का यह भी अनुमान है कि भारत का मनोरंजन एवं मीडिया उद्योग  2017 तक 2.25 लाख करोड़ रुपये तक हो जायेगा। फिक्की-केपीएमजी की रिपोर्ट 2013 के अनुसार मीडिया और मनोरंजन उद्योग 2012 में 2011 के मुकाबले 12.6 प्रतिशत बढ़ाकर 821 बिलियन रुपये हो गया है। 2017 के बारे में अनुमान है कि यह उद्योग 1661 बिलियन रूपये तक पहुंच जाएगा। वहीं भारत में विज्ञापन के मद में 2012 में 327.04 बिलियन रूपये खर्च किए गए।

इसी प्रकार यूरोपीय संकट के दौरान फिक्की-केपीएमजी की रिपोर्ट 2012 के मुताबिक मीडिया और मनोरंजन उद्योग 2011 में 2010 के मुकाबले 12 प्रतिशत बढ़कर 728 बिलयन रुपये का हो गया। 2011 में भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग ने 2010 के मुकाबले 12 प्रतिशत की दर से विकास किया। जब वैश्विक आर्थिक संकट आया हुआ था तब भी मीडिया और मनोरंजन उद्योग 2008 में 2007 के मुकाबले 12.4 प्रतिशत बढ़कर 584 बिलियन रुपये का हो गया । आउटलुक के पूर्व संपादक नीलाभ मिश्रा ने भी एक साक्षात्कार में यह माना है कि मंदी के दौरान उनकी पत्रिका आउटलुक के सर्कुलेशन पर कोई खास असर नहीं पड़ा। पत्रिका ने मंदी के दौरान मुनाफा कमाया। मीडिया संस्थानों को 2008-09 में मंदी के दौरान बढ़ी हुई दरों पर सरकारी विज्ञापन मिले और अखबारी कागज के आयत की ड्यूटी पर छूट भी मिली।



मंदी के दौरान छंटनी करने वाले मीडिया संस्थान
समूह
छंटनी
टीवी 18 समूह
350
ब्लूमबर्ग टीवी
30
आउटलुक मनी
14
दैनिक भास्कर
कई पत्रकार
पायनियर
35



मंदी के दौरान मीडिया कंपनियों का विस्तार
समूह
नई पहल
जी मीडिया
जी राजस्थान प्लस/एंड पिक्चर’/ अनमोल चैनल शुरू किया
जी मीडिया    
मौर्या टीवी के अधिग्रहण करने की अधिकारिक घोषणा की
लाइव इंडिया न्यूज चैनल
लाइव इंडिया’ अखबार लांच किया
टीवी 18 समूह
न्यूज 18 इंडिया’ (यू.के) को लांच किया
हिन्दुस्तान अखबार
रांची लाइव’ अखबार शुरू किया
सहारा इंडिया टेलीविजन नेटवर्क
समय राजस्थान’ चैनल लांच किया
टाइम्स टेलीविजन नेटवर्क
रोमेडी नाउ’ चैनल लांच किया

                                                                                         
                                                                                                                         जनमीडिया के नवम्बर 2013 के अंक प्रकाशित                                                           

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

वोटों का शिलान्यास

                                                           संजय कुमार बलौदिया
कुछ समय पहले ही डीयू और जेएनयू में छात्र संघ के चुनाव हुए उन चुनावों में डीयू में 40 फीसदी मतदान हुआ, जबकि जेएनयू में 55 फीसदी मतदान हुआ। इससे लगता है कि अब लोगों के साथ ही छात्र-छात्राएं भी चुनाव के दिन को घूमने-फिरने का दिन मानने लगे। तभी तो भई वोट डालने वालों का प्रतिशत गिरता जा रहा है। हम भले ही अपने कीमती वोट की कद्र न जाने, लेकिन नेता लोग हमारे वोट की कीमत खूब जानते है। तभी तो अब विधानसभा चुनावों से पहले जगह-जगह शिलान्यास और उद्घाटन हो रहे है। इसके साथ ही सड़कों को तुड़वाकर दोबारा बनवाने और नालों की सफाई करवाने जैसे काम जोर-शोर से चल रहे हैं। तो कहीं सस्ती प्याज बेची जा रही है। और तो और बस स्टैड़ों और सड़कों पर लगे सरकार के विज्ञापन भी विकास ही विकास बता रहे हैं। सरकार के विज्ञापनों का नारा भी है यहां विकास दिखता है 
इन दिनों अखबार या टीवी चैनलों पर जो कभी राजनीति, सिनेमा और अपराध की खबरों से पटे होते थे। वहीं अखबार और चैनल अब स्कूलों के उद्घाटन या सामुदायिक भवन के शिलायन्स या फिर किसी नई योजना के शिलान्यस की खबरें प्रकाशित या प्रसारित कर रहे हैं। वरना पहले तो विकास की खबरें ढूंढने पर भी नहीं मिलती थी। शायद यह चुनाव का ही असर है।
चुनावी आचार संहिता लागू होने के डर से नेताओं ने ताबड़तोड़ शिलायान्स किए। विधानसभा चुनाव को देखते हुए सरकार हो या विपक्षी पार्टी सभी शिलान्यास और उद्घाटन या नई योजनाओं को शुरू करने में व्यस्त है। दिल्ली सरकार के मंत्री ई-सब रजिस्ट्रार के कार्यालय, नए स्कूलों का उद्घाटन कर रहे और नई योजनाओं को भी हरी झंड़ी दे रहे। और तो और चंद दिनों में ही खाद्य सुरक्षा कानून, भूमि अधिग्रहण कानून और पेंशन फंड जैसे विधेयक भी आसानी से पास हो गए, जो काफी समय से लटके थे। खैर ये तो होना ही था, चुनाव जो नजदीक है। सरकार के विज्ञापनों और विकास की खबरों से ऐसा लगता है कि जैसे विकास की बाढ़ आई हो।
ऐसा सिर्फ दिल्ली में ही नहीं हो रहा है, मध्यप्रदेश में तो एक मंत्री ने आठ घंटे में दो हजार पांच सौ इक्यावन परियोजनाओं का शिलायान्स कर एक तरह का रिकॉर्ड बना दिया। आखिर चुनाव के नजदीक आते ही हर तरफ विकास कार्य क्यों दिखाने की कोशिश की जाती है। भई हम लोग अपने कीमती वोट की कीमत जाने या न जाने पर हमारे नेता लोग तो हमारे वोटों की कीमत बखूबी जानते हैं। तभी तो चुनावों से पहले विकास की बाढ़ आ जाती है। चुनाव के बहाने ही सही कुछ विकास कार्य तो हो जाता है। लेकिन हम लोग है कि फिर भी कहते है कि वोट देने का क्या फायदा। वोट का ही तो फायदा है जो चुनाव से पहले हमारे नेता लोग विकास कार्य करवाने लगते हैं। यह विकास कार्य हम लोगों के वोट पाने के लिए ही तो हो रहा है। भई विकास और विकास के विज्ञापन नहीं होंगे, तो भला नेताओं को वोट कैसे मिलेंगे। 


मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

बढ़ते उपभोक्ता या विकास

                                   
पिछले महीने जब दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने सांख्यिकी पुस्तिका-2013 जारी की। तब उसमें दर्ज आंकड़ों के आधार पर हिन्दी और अंग्रेजी के बड़े-बड़े अखबारों ने दिल्ली को देश का संपन्न राज्य बता दिया। दिल्ली सरकार ने विकास के आंकड़ों के जरिए विकास और समृद्धि को बताने की बखूबी कोशिश की। लेकिन सवाल ये है कि विकास क्या है। सामान्यतः विकास एक ऐसी प्रक्रिया को कहते है जिसके अन्तर्गत सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, तकनीकी आदि क्षेत्रों में न्यूनतम विकास हुआ हो, जिससे मनुष्यों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके। लेकिन अब लगता है कि विकास की परिभाषा बदलने की कोशिश की जा रही है। सिर्फ आर्थिक विकास को ही विकास बताने पर जोर दिया जा रहा है।

सांख्यिकी पुस्तिका की खबरों को जिस तरह से अखबारों ने प्रस्तुत किया। उससे तो लगता है कि दिल्ली पूरी तरह से विकसित हो चुकी है। अब दिल्ली जैसे राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, रोजगार विकास के मानकों में शामिल नहीं होते है  और मीडिया की प्राथमिकताओं में भी अब स्वास्थ्य, शिक्षा, गरीबी और रोजगार जैसे मुद्दे नहीं रह गए है। शायद इसी वजह से ज्यादातर अखबारों ने राजधानी में शराब पीने वालों की संख्या और उसकी खपत की मात्रा में बढ़ोत्तरी को बताया और 1.07 लाख लोगों के प्रतिदिन सिनेमा देखने को बताना जरूरी समझा। इसके साथ ही निजी वाहनों की संख्या बढ़ने और प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोत्तरी को विकास बताने की कोशिश की गई। सांख्यिकी पुस्तिका में शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, रोजगार और अपराध संबंधी जानकारी भी सम्मलित होती है, लेकिन किसी भी अखबार ने इन क्षेत्रों के आंकड़ों प्रमुखता नहीं दी।  

सरकार के इन आंकड़ों की पड़ताल कर खबर बनाने के बजाय उसे जनता के सामने उसी तरह से रख दिया गया, जिस तरह के आंकड़े सरकार ने प्रस्तुत किये। दूसरी बात यह है कि कैसे आज निजी वाहनों के बढ़ने, ज्यादा लोगों के शराब पीने और सिनेमा देखने को विकास के रूप में बताने और विकास की एक नई परिभाषा गढ़ने की कोशशि हो रही है। लोगों के अब उपभोक्ता बनते जाने और उनकी बढ़ती संख्या को ही विकास कहा जाने लगा है।  सरकार इसी अवधारणा को विकास मानने के लिए दूसरों लोगों को भी बाध्य कर रही है। अहम बात यह है कि मीडिया भी सरकार के विकास को विकास बताने में लगा है।

सरकार द्वारा प्रस्तुत सांख्यिकी पुस्तिका के आंकड़ों को ही अगर लिया जाए। तो सरकार के मुताबिक अब दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय सबसे अधिक है, लेकिन वहीं यह भी एक हकीकत है कि राजधानी दिल्ली में ही 44 फीसदी लोग गरीब भी है। जिनको सरकार खाद्य सुरक्षा कानून का लाभ देना चाहती है। भला यह कैसे हो सकता है कि सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय वाले राज्य में 44 फीसदी लोग गरीब हो। शिक्षा की अगर बात करें तो अब सेकेण्डरी और सीनियर सेकेण्डरी स्तर पर निजी स्कूलों की भागेदारी 43 फीसदी तक पहुंच गई है। वहीं मानव विकास रिपोर्ट 2013 के मुताबिक सरकार की सेवाओं का लाभ दिल्ली में सभी लोगों को समान रुप से नहीं मिल रहा है और यहां प्रति 10,000 लोगों पर कुल 4 डॉक्टर उपलब्ध है। इस रिपोर्ट को अगर देखा जाए तो दिल्ली को कैसे विकसित राज्य बताया जा सकता है।