रविवार, 28 सितंबर 2014

सिर्फ का विज्ञापन

                                                                      
मात्र  या सिर्फ एक ऐसा शब्द है जो पिछले एक दशक से कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक से लेकर रियल एस्टेट मार्केट तक काफी प्रचलित हो गया है। अंग्रेजी में इस शब्द के लिए ओन्ली का प्रयोग किया जाता है। आज अगर हम किसी चीज को खरीदने के लिए बाजार जाते है तो हमें वस्तु की कीमत लिखी हुई मिलती है कि यह वस्तु मात्र 499 रुपये की है। ठीक इसी प्रकार कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक और रियल एस्टेट के विज्ञापनों को देखें तो उनके विज्ञापनों में भी इस शब्द का बखूबी इस्तेमाल किया जाता है। उपभोक्ता इससे आकर्षित भी होते है।

कपड़े का विज्ञापन होगा, तो उसमें बताया जाता है कि सिर्फ 399 रुपये में शर्ट या टीशर्ट खरीद सकते है। इसी तरह से मोबाइल फोन के विज्ञापन में कहा जाता है कि मात्र 2999 रुपये में यह मोबाइल खरीद सकते है। यहां तक तो ठीक भी कहा जा सकता है, लेकिन रियल एस्टेट मार्केट ने तो इस शब्द को काफी अच्छे भूनाया है। रियल स्टेट के एक विज्ञापन को देखें। श्री बांके बिहारी मंदिर और एनएच-दो से मात्र 10 मिनट की दूरी पर और रेलवे स्टेशन से 1 किमी की दूरी पर अपना घर बुक कराएं। रियल एस्टेट के ज्यादातर विज्ञापन इसी तरह के होते है। एक अन्य विज्ञापन एक रूम फ्लैट रुपये 9 लाख रुपये में मात्र।

कभी-कभी विज्ञापनों में मात्र की जगह सिर्फ और केवल का भी प्रयोग किया जाता है। इस शब्द के जरिए कैसे कपड़े से लेकर रियल एस्टेट मार्केट तक ने लोगों को यह एहसास करवा दिया है कि यह चीज या सामान सस्ता है। कहा जाता है कि यह चीज सिर्फ या मात्र इतने की है। 299 रुपये, 399 रुपये बताने का जो ट्रेंड है वह यहीं बताता है कि यह चीज सस्ती है।   दुकानदार कहता है कि सिर्फ 399 रुपये की ही तो है। तब हमें लगता है कि वाकई यह चीज तो सस्ती है। जबकि ऐसा नहीं है।

रियल एस्टेट ऐसा सेक्टर बनकर उभरा है जो टीवी से ज्यादा प्रिंट मीडिया के लिए विज्ञापन जारी करता है। अखबारों में रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के विज्ञापनों की भरमार होती है। रियल एस्टेट के लिए जैसे मात्र या सिर्फ शब्द वरदान बन गया है। तभी तो बिल्डर बड़े आराम से अपने फ्लैट या ऑफिसों के आस-पास बने मंदिर, हाईवे, मेट्रो और विश्वविद्यालय को ग्राहकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बनाकर फ्लैट या ऑफिस बेच रहा है, जबकि इन सुविधाएं को ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए उसने कोई खास मेहनत नहीं की। इंसान अपने घर के आस-पास मूलभूत सुविधाओं की इच्छा तो रखता ही है, लेकिन वह बिल्डर अपने विज्ञापन में अस्पताल, स्कूल, मंदिर और मेट्रो को आकर्षण के तौर पर इस्तेमाल करता है। अब तो रियल एस्टेट मार्केट के लोगों ने हद कर दी है। आजकल तो बिल्डर अपने विज्ञापनों में किसी नये हाइवे या विश्वविद्यालय बनने के प्रस्ताव को भी ग्राहकों के आकर्षण का केन्द्र बनाने की कोशिश कर रहे है। अमूमन इन आकर्षणों के दम पर ही बड़े-बड़े बिल्डर जिनके फ्लैट्स की कीमत कभी 10 लाख होती थी, वह उन्हीं फ्लैटों को बड़े आराम से अब 25 लाख तक में बेच रहे हैं।

इन विज्ञापनों के कारण ही नौकरी लगते ही इंसान अपने लिए फ्लैट बुक कराने की जुगत में भिड़ जाता है। वह रियल एस्टेट की वन बीएचके, टू बीएचके डुप्लेक्स, मिनी टाउनशिप की शब्दावली से भी परिचित हो गया है। इंसान के इसी अपना घर पाने की इच्छा को रियल एस्टेट ने अच्छे से भूनाया है।

कहा जाता है कि विज्ञापन में कहे गए शब्द ही विज्ञापन को आकर्षक बनाते है। रियल ऐस्टेट के विज्ञापनों में प्रयोग मात्र या सिर्फ शब्द ने ही विज्ञापन को प्रभावी और आकर्षक बना दिया है। इन्हीं विज्ञापनों से प्रभावित होकर ही लोग बड़ी परियोजना में निवेश कर रहे हैं।

रविवार, 21 सितंबर 2014

हिन्दी का विकास हो रहा है !

                                                                                                         - संजय कुमार बलौदिया
आज हिन्दी अखबारों के भले ही करोड़ों पाठक है। हिन्दी अखबारों के करोड़ों पाठकों के आधार पर कहा जाता है कि हिन्दी फल-फूल रही है। लेकिन शायद हम यह भूल जाते है कि आज के हिन्दी अखबार अब सिर्फ हिन्दी के नहीं रहे है, बल्कि वह हिंग्लिश भाषा के हो गए है। साथ ही अखबारों में अंग्रेजी के शब्दों का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है।     

जब देश में सबसे पहले मध्यप्रदेश के एक स्थानीय अखबार ने विज्ञापनों को हड़पने की होड़ में, बाकायदा सुनिश्चित व्यावसायिक रणनीति के तहत अपने अखबार के कर्मचारियों को हिन्दी में 40 प्रतिशत अंग्रेजी के शब्दों को मिलाकर ही किसी खबर के छापने के आदेश दिए और इस प्रकार हिन्दी को समाचार पत्र में हिंग्लिश के रूप में चलाने की शुरुआत की गई। पिछले एक-डेढ़ दशक में हिंदी के ज्यादातर अखबारों और चैनलों ने हिंदी को आसान बनाने के नाम पर धड़ल्ले अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करना शुरू कर दिया और अब हिंदी का वाक्य बिना अंग्रेजी के शब्द के पूरा ही नहीं होता है। क्या हिंदी को आसान बनाने के लिए बोलियों और भारतीय भाषाओं से शब्द नहीं लिए जा सकते है। अगर बोलियों और भारतीय भाषाओं के शब्दों को हिन्दी को आसान बनाने में प्रयोग किया जाता, तो अंग्रेजी वर्चस्व कैसे बना रहता। संसार की इस दूसरी बड़ी बोली जाने वाली भाषा से उसकी लिपि छीनकर उसे रोमन लिपि थमाने की दिशा में हिन्दी के सभी अखबार जुट गए हैं।

हिंदी और पत्रकारिता दोनों का आपस में रिश्ता रहा है। उन्हें अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। हिन्दी को पालने-पोसने में हिन्दी पत्रकारिता ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन अब वहीं हिंदी पत्रकारिता करने वाले अखबार अंग्रेजी के वर्चस्व को बनाये रखने में जुट गए है। अब तो हिंदी अखबार एक कदम आगे बढ़कर अपने पाठकों को अंग्रेजी भी सिखाने लगे हैं। इसके लिए निर्धारित पृष्ठों पर अंग्रेजी शब्द देकर उच्चारण को सुधारने या अंग्रेजी वाक्य बनाने भी सिखाए जा रहे है। आज कई अखबारों और चैनलों की भाषा हिंदी न होकर हिंग्लिश रह गई है।

ठीक इसी तरह हिंदी सिनेमा भी तेजी से फल-फूल रहा है। आज हमारी फिल्में तो हिन्दी में है, लेकिन उनके नाम अंग्रेजी में हो गए है जैसे - वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई, देल्ही बेली, फाइंडिंग फेनी और क्रीचर 3 डी आदि। ऐसा लगता है कि हिन्दी सिनेमा के पास भी फिल्मों के लिए हिंदी के शब्द कम पड़ गए है। इसके बावजूद हिन्दी सिनेमा व्यवसाय तेजी बढ़ रहा है, तो इसकी भी वजह हिंग्लिश ही है।

संविधान में हिंदी को संघ की राजभाषा का दर्जा 14 सितम्बर 1949 को दिया गया था इसी वजह से 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिले छह दशक से भी ज्यादा समय हो गया है, लेकिन हमारे देश में हिंदी अभी तक प्रशासनिक काम-काज की भाषा नहीं बन पाई है। आज भी चाहे प्रश्न-पत्र हो या सरकारी चिट्ठी, राज-काज की मूल प्रामाणिक भाषा अंग्रेजी ही है। पूरी दुनिया में बार-बार यह बात साबित हुई है कि शिक्षा में जितनी सफलता मातृ-भाषा माध्यम से प्राप्त होती है उतनी सफलता विदेशी भाषा माध्यम से प्राप्त नहीं हो सकती। लेकिन हमारे नीति निर्माता यह मानकर बैठे है कि अंग्रेजी के बिना हमारा विकास हो ही नहीं सकता। इसी का नतीजा है कि देश में उच्च शिक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता कानूनी नहीं है, लेकिन उसे अनिवार्य की तरह लागू करने की कोशिश तेजी से हो रही है। हमारे देश में यह मान लिया गया है कि अंग्रेजी ही ज्ञान की एकमात्र भाषा है। आज दुनिया के लगभग सभी गैर-अंग्रेजी भाषी देश अपने देशों से अंग्रेजी भाषा के प्रभाव को समाप्त करने में लगे हैं। लेकिन हम लोग अपनी सारी शिक्षा, संस्कृति, संचार अंग्रेजी भाषा के हवाले किए जा रहे हैं।     
  
करीब सौ साल पहले तक हमारे समाज के प्रबुद्ध वर्ग के लोगों ने अंग्रेजी सीखने के बावजूद अपनी मातृभाषा में काम किया। लेकिन हम लोग अंग्रेजी सीखने के लिए अपनी मातृभाषा और भारतीय भाषाओं की उपेक्षा करने से भी पीछे नहीं हट रहे है। अन्य भाषाओं को सीखने की बात ही कहां रह जाती है। जबकि अमेरिका जैसा देश भी अपनी मातृभाषा के साथ ही अन्य भाषाओं को सीखने की कोशिश करता है। इसी तरह चीन, जापान भी अपनी भाषा में ही काम कर रहे है और अन्य भाषाओं को भी सीख रहे है। लेकिन हम लोग अंग्रेजी के पीछे इसलिए पड़े है ताकि अच्छी नौकरी मिल जाए। यह भी जरूरी नहीं है कि अंग्रेजी की डिग्री या अंग्रेजी सिखने के बाद भी नौकरी मिल ही जाए। फिर भी हम लोग अपने बच्चों पर अंग्रेजी सिखने के लिए दबाव बनाते रहते है।          

रविवार, 13 जुलाई 2014

छात्रों का एक साल बर्बाद करने वाली व्यवस्था

                                                -संजय कुमार बलौदिया

दिल्ली विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग (एसओएल) का परीक्षा परिणाम  हर बार स्नातकोत्तर में दाखिले की प्रक्रिया पूरी होने के बाद आता है। इस वजह से विद्यार्थियों को रेगुलर स्नातकोत्तर कोर्स में दाखिला नहीं मिल पाता है। इस वर्ष एसओएल के छात्र-छात्राओं ने रिजल्ट के देर से आने को लेकर विरोध प्रदर्शन भी किया। वहीं एसओएल में पुनर्मूल्यांकन करवाने वाले छात्र-छात्राओं का रिजल्ट भी देरी से आया। जिससे उन छात्रों को कहीं दाखिला नहीं मिला और उनका एक साल बर्बाद हो गया। 

दिल्ली विवि में चार वर्षीय पाठ्यक्रम को लागू करने के बाद से पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया को खत्म कर दिया गया। लेकिन दिल्ली विवि के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग में चारवर्षीय पाठ्यक्रम न होने के कारण वहां पुनर्मूल्यांकन व्यवस्था है। इस व्यवस्था का लाभ उठाने और अपना एक साल बचाने के लिए कुछ छात्र-छात्राएं पुनर्मूल्यांकन करवाते हैं। मैंने आरटीआई के जरिए पुनर्मूल्यांकन के संबंध में जानकारी जुटाई। मई-जून 2013 (चौथे सेमेस्टर) में एम.ए राजनीति विज्ञान के 38 छात्र-छात्रों और एम.ए हिंदी के 5 छात्र-छात्राओं ने पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन किया। एम.ए राजनीति विज्ञान में पुनर्मूल्यांकन में 38 में से 11 छात्र और एम.ए. हिन्दी में 5 में से 1 छात्र पास हो गया। इससे पता चलता है कि 25 से 30 फीसदी छात्र पुनर्मूल्यांकन के दौरान पास हो रहे है। इसे एक उदाहरण के रूप में लिया जाए तो अन्य विषयों के छात्र-छात्राओं ने भी पुनर्मूल्यांकन करवाया होगा। इस एक आंकड़े से यह भी समझा जा सकता है कि दिल्ली विवि के एसओएल में कैसे छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। एक बात तो यह स्पष्ट होती है कि उत्तरपुस्तिकाओं का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं होता है। दूसरी बात यह है पुनर्मूल्यांकन व्यवस्था के जरिए एक तरफ छात्रों को लूटा जा रहा और वहीं छात्रों का साल भी नहीं बच रहा है।

पुनर्मूल्यांकन व्यवस्था को लागू करने के पीछे उद्देश्य छात्रों का एक साल बचाना था। पुनर्मूल्यांकन के नियमानुसार 45 से 60 दिन के भीतर रिजल्ट आ जाना चाहिए, लेकिन एसओएल के जिन छात्रों पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन किया, उनका रिजल्ट 2 महीने 18 दिन में आया। जैसा कि एसओएल का परीक्षा परिणाम देरी से आता है, ठीक उसी तर्ज पर पुनर्मूल्यांकन करवाने वाले छात्रों का रिजल्ट भी देरी से आया। जिससे उन छात्रों को कहीं भी दाखिला नहीं मिला और उनका एक साल बर्बाद हो गया, तो पुनर्मूल्यांकन व्यवस्था के होने का क्या मतलब रह जाता है। पुनर्मूल्यांकन की व्यवस्था होना ही काफी नहीं, उस व्यवस्था का छात्र-छात्राओं को लाभ भी मिलना चाहिए।

 ठीक इसी तरह का मामला दिल्ली विवि के कॉलेजों के छात्रों ने उठाया था जब एक खास विषय में उन्हें कम अंक दिए गए थे और उन्होंने पुनर्मूल्यांकन की मांग भी की थी। पुनर्मूल्यांकन के समय को लेकर मार्च 2011 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) को कक्षा 12 वीं के छात्रों के अंकों को पुनर्मूल्यांकन समयबद्ध ढंग से पूरा करने के लिए एक तंत्र विकसित करने का निर्देश दिया था। लेकिन लगता है कि उच्च न्यायालय के निर्देश से कोई सबक दिल्ली विवि के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग ने नहीं लिया। 

रविवार, 16 मार्च 2014

पत्रकारिता का प्रशिक्षण ही बन गया है पत्रकारिता

                                                         – संजय कुमार बलौदिया

पिछले एक दशक में पत्रकारिता के शिक्षण संस्थानों का तेजी से विस्तार हुआ है। पत्रकारिता के क्षेत्र को जिस तरह ग्लैमर्स की दुनिया बताकर प्रचारित किया जा रहा है। इससे छात्र-छात्राओं का पत्रकारिता की ओर रुझान तेजी से बढ़ा है। इसी वजह से आज कई तरह के मीडिया संस्थान सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और डिग्री कोर्स चल रहे है। ये संस्थान एंकर, रिपोर्टर और कैमरामैन बनाने के लिए सर्टिफिकेट और डिप्लोमा भी बांट रहे हैं। पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और बदलती तकनीक के कारण ही इस क्षेत्र में प्रशिक्षण को जरूरी समझा गया। प्रशिक्षण का सामान्य अर्थ है कि किसी भी काम को और बेहतर तरीके से करना है। पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रशिक्षण शब्द को सिर्फ तकनीक अर्थों तक ही समेट दिया गया है। इस वजह से ऐसा लगता है कि जैसे पत्रकारिता का प्रशिक्षण ही पत्रकारिता है। 

अभी हाल ही में विश्व पुस्तक मेले के दौरान पत्रकारिता के कुछ छात्र-छात्राओं और अध्यापकों को देखा जो मीडिया लेखन, समाचार लेखन, रेडियो लेखन जैसी किताबें खोज रहे थे। उन्हें काफी समझाने की कोशिश की इस प्रकार की किताबों से पहले पत्रकारिता को लेकर एक समझ बनाने की जरूरत है। लेकिन शायद वह समझना ही नहीं चाहते थे और वह इन किताबों को खोजते हुए आगे बढ़ गए। 

दरअसल बात यह है कि बीते एक दशक में जिस तरह से पत्रकारिता के क्षेत्र को प्रचारित किया गया है। उससे अब छात्र-छात्राओं को पत्रकारिता का प्रशिक्षण/पाठ्यक्रम ही पत्रकारिता लगने लगा है और वह पाठ्यक्रम की किताबें पढ़कर ही पत्रकारिता कर लेना चाहते है। ये छात्र-छात्राएं खबरों को जानना-पहचानना और खोज नहीं चाहते हैं। इनके अध्यापक भी सिर्फ छात्र-छात्राओं को इतना ही तो सिखाना चाहते है कि समाचार कैसे लिखे, रेडियो के लिए कैसे लिखे, पैकेज कैसे काटें, एकरिंग कैसे करें या फिर रिपोर्टिंग संबंधी कुछ जानकारी भी दे देते हैं। इससे ज्यादा हुआ तो टाइपिंग और पेज डिजाइनिंग सीखा दी जाती है। इसके बाद वह एक पत्रकार बन जाता है और किसी मीडिया संस्थान में 5 डब्ल्यू 1 एच का प्रयोग करते हुए खबरें लिखता रहता है या पैकेज काटता रहता है। वह इस फार्मूले से आगे बढ़कर खबर की पहचान नहीं कर पाता है और ना ही किसी प्रकार का प्रयोग कर पाता है।  

पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रशिक्षित पत्रकार को तकनीकी प्रशिक्षण तो मिल जाता है, लेकिन इस पेशे के लिए जो  सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समझ बननी चाहिए, वह नहीं बन पाती है। जिससे आज के पत्रकार सामाजिक सरोकारों से दूर होते नजर आते हैं। तकनीक प्रशिक्षण के महत्व को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन इसके दूसरे पक्ष को अनदेखा करना भी सही नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह पत्रकारिता के सभी संस्थानों का एक जैसा पाठ्यक्रम/प्रशिक्षण है और बाजार का दबाव भी है। जिस वजह से आज इस तरह के पत्रकार तैयार किये जा रहे हैं। पत्रकारिता को चाहकर भी पाठ्यक्रम के दायरे नहीं समेटा जा सकता। लेकिन अब स्थिति ऐसी हो गई कि पत्रकारिता के प्रशिक्षण/पाठ्यक्रम को ही पत्रकारिता समझा जाने लगा है। इससे कहीं न कहीं पत्रकारिता लेखन सिमटता नजर आ रहा है। पत्रकारिता जैसे क्षेत्र के लिए यह स्थिति बहुत खतरनाक है। यह स्थिति आगे आने वाली पत्रकार पीढ़ी के लिए बेहद खतरनाक होगी। 










किशोर और नए लोगों की अपराधों में बढ़ रही है संलिप्तता

                                                                       -संजय कुमार बलौदिया
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने कुछ समय पहले ही आंकड़े जारी किए। जिसके अनुसार दिल्ली में पिछले साल 2012 के मुकाबले 2013 में 43.67 फीसदी अपराधिक मामलों में बढ़ोत्तरी हुई हैं। बढ़ते अपराधिक मामले चिंता का विषय है। इन्हीं आंकड़ों में यह भी बताया गया है कि दिल्ली में 2012 के मुकाबले 2013 में हत्या के मामलों में कमी आई है। 2012 में 504 हत्याएं हुई जबकि 2013 में 487 हत्याएं हुई। भले ही हत्या संबंधी मामलों में कमी आई हो, लेकिन 2013 में हत्या जैसे मामलों को अंजाम देने वाले लोगों में 96 फीसदी लोग पहली बार अपराध करने वाले हैं। जिसमें सिर्फ 1.5 लोग ही ऐसे है जिनका पहले अपराधिक रिकॉर्ड रहा है। अपराध के बढ़ते आंकड़ों से ज्यादा चिंताजनक यह है कि कैसे लोगों में हिंसक प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती जा रही हैं।

वहीं दिल्ली में 2012 में 680 बलात्कार की घटनाएं हुई जबकि 2013 में बलात्कार की घटनाओं का यह आंकड़ा बढ़कर 1559 हो गया है। 2012 में 62 किशोरों को बलात्कार के मामलों में और हत्या के मामलों में 97 किशोरों को गिरफ्तार किया गया। एनसीआरबी के आंकड़ो के अनुसार 2012 में भारतीय दंड संहिता के तहत अपराधों के आरोपों में 18 साल से कम आयु के 35465 किशोर गिरफ्तार किए गए। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक ही 2002 में बलात्कार मामले में 485 किशोर संलिप्त थे जबकि 2012 में यह आंकड़ा बढ़कर 1,175 हो गया। ठीक इसी प्रकार 2002 में हत्या के मामले में 531 किशोरों को गिरफ्तार किया गया, जबकि 2012 में यह आंकड़ा बढ़कर 990 हो गया है। इसी प्रकार अन्य अपराधों में भी किशोरों की संलिप्तता बढ़ती जा रही है।

एनसीआरबी के आंकड़ों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि किशोरों की अपराधों में संलिप्तता तेजी से बढ़ती जा रही है। वहीं नए लोगों द्वारा हत्या जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम देने के मामलों में भी बढ़ोतरी हो रही है। हमें अब अपराध के आंकड़ों को कम करने के साथ-साथ यह भी सोचना होगा कि किशोरों व नये लोगों की अपराधों में संलिप्तता को कैसे रोका जाए।

एक रिपोर्ट के मुताबिक कई बार किशोर, अपराध गुस्से के कारण या बदला लेने के लिए करते हैं और कई बार तो फिल्मों में देखे गए दृश्यों की नकल करने के लिए भी करते हैं। किशोरों को पारिवारिक वातावरण और उनके आसपास की परिस्थितियां ही उसे अच्छा या बुरा नागरिक बनाती है। वहीं अकेलापन और उपेक्षा किशोरों को अपराधिकता की ओर धकेलती है। अकेलापन किशोरों को क्रूर बनाता है। जिससे वह नशा करने और अपराधिक गतिविधियों में संलिप्त होने लगते है। इन वजहों से भी आज किशोरों और नए लोगों की बलात्कार, हत्या जैसे जघन्य अपराधों में संलिप्तता बढ़ती जा रही है।

आमतौर पर कहा जाता है कि निम्न आर्थिक वर्ग से संबंधित किशोर और लोग ही अपराधों को अंजाम देते है। यह बात एक हद सही हो सकती है। लेकिन यह भी सच है कि अब पढ़े-लिखे किशोर और नए लोग भी अपराधों को अंजाम देने में पीछे नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि आज के माता-पिता भौतिकता और महत्वकांक्षा की अंधी दौड़ में लगे हुए हैं, जिससे वह अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं। जिससे बच्चों को सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता है। जिससे युवा भटक जाते है। आज के प्रतिस्पर्धा के युग में युवा भी ढेर सारी भौतिक सुख-सुविधाओं को पाने की अंधी दौड़ में लगे हुए है। वह इन सुख-सुविधाओं को पाने के लिए अपराध की दुनिया की ओर भी आकर्षित हो रहे हैं। अपराधों के बढ़ने का एक कारण अपराधी को दण्डित किये जाने और न्याय सुलभता की दर का नीचे गिरना भी है।

किसी भी कानून से अपराधों को कम तो किया जा सकता है लेकिन खत्म नहीं किया जा सकता। आपराधिक मानसिकता को कानून के जरिए खत्म नहीं किया जा सकता। हमें किशोरों को स्वस्थ व सुंदर समाज देना होगा, तभी वह अपराधिक मानसिकता से मुक्त हो पाएंगे।



मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

सुंदरता के बाजार ने बढ़ाई लोगों में सुंदर बनने की चाह

                                                  -संजय कुमार बलौदिया
पिछले दिनों द इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ एस्थेटिक प्लास्टिक सर्जरी का सर्वे प्रकाशित हुआ जिसके मुताबिक कॉस्मेटिक सर्जरी के मामले में अमेरिका, चीन और ब्राजील के बाद भारत चौथे स्थान पर आता है। यह आंकड़ा भारत की कुल आबादी पर आधारित है। सोशल न्यूज नेटवर्क वोकेटिव के अनुसार सर्जरी का बड़ा कारण सोशल साइट पर दूसरों से ज्यादा बेहतर दिखने की होड़ को बताया गया है। प्लास्टिक सर्जरी करवाने वालों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। अब लोग सिर्फ इसलिए सर्जरी करवाने लगे है कि उन्हें फेसबुक पर सुंदर दिखना है। सोशल साइट्स पर ज्यादा दोस्त बनाने के लिए और ज्यादा लाइक पाने के लिए भी लोग सुंदर दिखना चाहते है। इस बात से समझा जा सकता है कि पिछले एक दशक में कैसे सुंदरता को लोगों के बीच प्रचारित किया गया है और सुंदरता के मायने बदल दिये गये है। पूंजीवादी व्यवस्था में महिला के शरीर और उसकी सुंदरता को बाजार में बेचने वाले उत्पाद के तौर पर पेश किया जाता है। पहले लोगों के लिए सुंदरता व्यक्ति के व्यक्तित्व से होती थी। लेकिन अब लोगों के लिए सुंदरता के मायने सिर्फ आकर्षक दिखने और जवान दिखने तक सिमट कर रह गए है। सुंदर दिखने की इच्छा हर व्यक्ति की होती है, लेकिन सिर्फ बाहरी सुंदरता को ही सुंदरता मान लेना कितना सही है।

दरअसल सवाल यह है कि लोगों के सुंदर दिखने की चाह को बाजार ने कैसे भुनाया और बढ़ाया है। आज अलग-अलग ब्रांड की हजारों तरह की क्रीमों से बाजार अटे पड़े है। कई कंपनियों ने तो उम्र और स्किन के हिसाब से अलग-अलग फेशियल भी लॉन्च किए है। रोज कोई न कोई नया ब्रांड सुंदर दिखने की क्रीम लांच कर रहा है। पहले महिलाओं के लिए ही सुंदर दिखने की क्रीम और फेसियल उपलब्ध थे, लेकिन आज कई कम्पनियां पुरुषों को भी सुंदर बनाने काम में जुट गई है और पुरुषों के लिए भी कई तरह की क्रीम्स मार्केट में उपलब्ध है। अब इसके एक कदम आगे बढ़कर तकनीक के जरिए लोगों को सुंदर बनाने की कोशिश की जा रही है। यह तकनीक कॉस्मेटिक सर्जरी है। कॉस्मेटिक सर्जरी को त्वचा में कसाव लाने के लिए किया जाता है। पहले जो कास्मेटिक सर्जरी गम्भीर चोट के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाती थी, वही सर्जरी आज लोगों को मनचाहा रूप दे रही है। यह प्रोडक्ट्स या सर्जरी लोगों को यह विश्वास दिलाते है कि उनकी बढ़ती उम्र में भी वह पहले की तरह आकर्षक और जवान दिखेंगे और इन प्रोडक्ट्स से उनका जीवन, कैरियर और संभावनाएं खिल उठेंगी। जबकि इन प्रोडक्ट्स या सर्जरी से लोगों के दिखने में कोई खास अंतर नहीं आता है, लेकिन उसके बावजूद भी लोग इस सुंदरता को पाने होड़ में लगे रहते है।  जिससे आज मार्केट में लोगों को सुंदर बनाने के लिए अलग-अलग तरह की क्रीमों से लेकर कई तरह के सर्जरी पैकेज भी उपलब्ध है।  

एक खबर के मुताबिक देश में सौंदर्य प्रसाधनों का कारोबार साल 2012-13 में 10,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गया। विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2007 से अब तक राइनोप्लास्टी ( नाक की सर्जरी) के मामलों में 2400 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है। कॉस्मेटिक सर्जरी का व्यापार अरबों डॉलर के आंकड़े पर पहुंच चुका है। आज स्त्री सुंदरता के संदर्भ में स्त्री के स्तन, उसकी कमर और उसके नितंबों का एक खास साइज होना चाहिए, जो बाजार के बनाए मानक के अनुसार हो, अन्यथा वह स्त्री सुंदर नहीं कही जाएगी। स्त्री की इसी छवि को विज्ञापनों के जरिए खूब प्रचारित किया जा रहा है। इसके पीछे कॉस्मेटिक इंडस्ट्री और हेल्थ इंडस्ट्री की भी अहम भूमिका है।

प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक में कई तरह की सुंदर बनाने वाली क्रीमों या सर्जरी के विज्ञापन बखूबी देखने को मिल जाते है। इनके अलावा अब समाचारपत्रों में एक पेज पर सुंदरता को लेकर कई तरह की फीचर स्टोरी भी दी जाती है जिसमें यह बताया जाता है कि कैसे क्रीम्स या सर्जरी से सुंदर बना जा सकता है और प्रकृति उपायों द्वारा भी सुंदर बनने के बारे में बताया जाता है। इसके अलावा सर्जरी को करवाने के खर्च से लेकर उन संस्थानों तक की जानकारी भी दी जाती है। इस प्रकार देखा जा सकता है कि किस तरह से मीडिया भी बाजार द्वारा बनाई गई सुदंरता को खूब प्रचारित-प्रसारित कर रहा है। जिससे अब लोगों के लिए सबसे जरूरी सुंदर दिखना हो गया है। कैरियर, पदोन्नति, दोस्तों की संख्या बढ़ाने या लाइक पाने के लिए और आत्मविश्वास पाने के लिए भी सुंदर दिखना जरूरी है। कुल मिलाकर बाजार की सुंदरता के मानदंडों से ही आप स्वयं को सुंदर मान सकते है, वरना नहीं। अब तो लोग जॉब इंटरव्यू और पदोन्नति के लिए भी कॉस्मेटिक सर्जरी करवाने लगे।

पिछले साल एसोसिएशन ऑफ प्लास्टिक सर्जंस ऑफ इंडिया के एक अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों में सीने की सर्जरी ने पिछले 5 साल में 150 फीसदी की बढ़त दर्ज की है। पिछले कुछ सालों में ब्रेस्ट सर्जरी अब बेहद लोकप्रिय कॉस्मेटिक सर्जरी में बन गई है। इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ एस्थेटिक प्लास्टिक सर्जरी सर्वे के मुताबिक, भारत में 2010-11 में 51,000 ब्रेस्ट सर्जरी की गई, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 15 लाख है। इस प्रकार समझ जा सकता है कि भारत में सर्जरी कराने की गलत प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। भले ही कॉस्मेटिक सर्जरी महंगी न हो, लेकिन इसके नुकसानों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अभी हाल ही में जामा प्लास्टिक फेसियल सर्जरी ने अपने एक अध्ययन में कहा है कि चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी से मरीजों के युवा दिखने में सिर्फ तीन साल का अंतर आता है। सर्जरी से पहले मरीजों की उम्र क्रमशः 2.1 साल कम उम्र दिखती और सर्जरी के बाद 5.2 साल अधिक जवान दिखते कुल मिलाकर आकर्षक या जवान दिखने में औसतन सिर्फ 3.1 साल का अंतर आता है।

इस अध्ययन और द इंटरनेशनल सोसायटी आफ एस्थेटिक प्लास्टिक सर्जरी के सर्वे से यह बात साफ हो जाती है कि बाजार की सुंदरता और सुंदरता के लिए होने वाली प्रतियोगिताओं ने लोगों को कैसे प्रभावित किया है। पुरुषों के लिए सुदंरता का मतलब सीना सुस्त होना चाहिए और पेट पर अनचाही चर्बी नहीं होनी चाहिए। महिलाओं के संदर्भ सुंदरता, उनका सीना, उनकी कमर, उनके नितंब और उनका वजन बाजार की सुंदरता के मापदंड के अनुसार होना चाहिए। इस सुंदरता को पाने के लिए लोगों की बीच एक होड़ सी लगी है। इससे वह लोग जो इस प्रकार की सुंदरता हासिल नहीं कर पाते है, वह स्वयं को हीन भावना से देखने लगते हैं। इससे वह स्वयं को सुंदर नहीं मानते है। भले ही यह कहा जाता है कि रंग के आधार पर भेदभाव खत्म हो गया हो, लेकिन सच यह है कि सुंदरता का यह विचार लोगों में एक प्रकार की विषमता को जन्म दे रहा है। जिससे लोगों में कहीं न कहीं इस सुंदरता को पाने की लालसा बढ़ती जा रही है और लोग सुंदरता के इन मापदंडों के अनुसार सुंदर दिखने की होड़ में शामिल होते जा रहे हैं।  

कीमती एक रुपया

                                                                                     -संजय कुमार बलौदिया
अभी कुछ दिन पहले एक प्रदर्शन के दौरान अपने कुछ पुराने दोस्तों से मुलाकात हो गई। तब हम सभी दोस्त नोएडा सेक्टर 16 मेट्रो स्टेशन के पास चाय पीने के लिए जगह ढूंढ रहे थे। तभी हमारा एक दोस्त मेट्रो स्टेशन पर लगे स्टॉल से पानी की बोतल लेने गया। पानी की बोतल की कीमत 18 रुपये थी, लेकिन दुकानदार कह रहा था कि यह बोतल 20 रुपये की है। हमारे दोस्त के ज्यादा बहस करने के बाद दुकानदार कहने लगा कि भईया आप तीन रुपये खुले दे दो। वरना पानी की बोतल 20 रुपये की ही है। तब हमारे मित्र ने वापस आकर खुले तीन रुपये मांगे और जाकर दुकानदार को देकर आया।  कुछ दिन बाद ही एक मेट्रो स्टेशन पर मजदूर टिकट ले रहा था। उसका टिकट 21 रुपये का था। मेट्रो कर्मचारी ने मजदूर से एक रुपया खुला मांगा, लेकिन मजदूर के पास दो रुपये का सिक्का था। मजदूर ने दो रुपये का सिक्का मेट्रो कर्मचारी दे दिया, मेट्रो कर्मचारी ने एक रुपये का सिक्का वापस देने के बजाए कह दिया कि हिसाब हो गया। 

 दरअसल बात यह है कि आज एक या दो रुपये वापस न करना एक चलन सा बन गया है। वहीं हमारे समाज में अगर कोई व्यक्ति बचा हुआ एक रुपया या दो रुपया मांगता है, तो लोग उसे अचरज से देखने लगते है कि वह भला एक या दो रुपये का क्या करेगा। खैर अब बचा हुआ एक रुपया मांगने का झमेला ही खत्म करने का और मुनाफा कमाने का नया रास्ता एक टेलीकॉम कंपनी ने निकाला है। यह बात उस कंपनी के विज्ञापन से समझी जा सकती है। यह विज्ञापन आजकल टीवी चैनलों पर काफी छाया हुआ हैकि एक रुपये के बदले में वीडियो देखे, सिर्फ एक रुपये का ही है। इस विज्ञापन के जरिए कंपनी अपनी एक सेवा का प्रचार कर रही है और एक रुपये की कीमत को भी बखूबी बता रही है। लेकिन यहां एक अहम बात यह है कि एक रुपये की कीमत सिर्फ और सिर्फ वीडियो को देखने के लिए है। वीडियो देखने अलावा एक रुपये से आप और कुछ नहीं कर सकते है।

कुछ समय पहले पच्चीस पैसे, फिर पचास की कीमत खत्म कर दी गई। आज लोग आधुनिक परिवेश में एक या दो रुपये की कीमत कम आंकने लगे है। भला एक या दो रुपये वैसे भी है ही क्या। आजकल बस में, मेट्रो स्टेशन पर या डाकघर में जाइए या फिर कहीं भी, वहां पर भी आपको एक ही जवाब मिलेगा कि एक या दो रुपये खुले नहीं है या फिर खुले पैसे दो। अगर खुले पैसे है तो ठीक वरना एक या दो रुपये छोड़ दो। अब लोगों को अपनी जेबों में कम से कम 25 से 50 रुपये खुले लेकर चलना चाहिए। वरना शाम 10-20 रुपये तो ऐसे ही ठग लिये जाएंगे। ऐसे में अमीर आदमी के लिए एक या दो रुपये कोई मायने नहीं रखते हो, लेकिन किसी गरीब के लिए एक या दो रुपये मायने रखता है। जब कोई अमीर आदमी किसी सेवा को लेने के बाद कहता है कि एक या दो रुपये खुले नहीं है, तो कोई बात नहीं है। वहीं से यह सारी कहानी शुरू होती है। अब जब कोई गरीब उस सेवा का इस्तेमाल करता है, तब वह विक्रेता या दुकानदार उसे भी कहेगा कि एक या दो रुपये खुले नहीं। अगर कोई डाकघर की सेवा ले रहा है, तो बचे हुए एक या दो रुपये मांगने पर डाक  टिकट थामा दिया जाता है।

सूचना क्रांति के दौर में एक रुपये को चुकाने के बदले में नया तरीका वीडियो को दिखाने का इजाद किया गया है। इस वीडियो से भी उपभोक्ता बेचारा पहले की तरह ही ठगा जाएगा, लेकिन उसे ठगे जाने का एहसास नहीं होने दिया जाएगा। अब अगर कोई उपभोक्ता एक रुपया मांगेगा, तो लोग उसे फट से वीडियो दिखाने लगेंगे। सवाल यह है कि वह उपभोक्ता वीडियो क्यों देखे। दूसरी बात यह है कि अब बाजार या कंपनियां तय कर रही है कि हम कैसे रुपया खर्च करेंगे।

इस एक रुपये की गतिविधि को हम भले ही छोटी या कमतर आंके, लेकिन हकीकत यही है कि इस एक रुपये से ही ठगी का खेल शुरू होता है। पहले एक रुपये, अब दो रुपये, इसके बाद होगा कि पांच रुपये नहीं है। हमारे लिए उस एक रुपये का मतलब न हो, लेकिन यह सोचने वाली बात है कि कैसे एक व्यक्ति से एक, दो रुपये आसानी से खुलेआम लूटे जा रहे है। सबसे मजेदार बात तो यह है कि इस लूट की कोई शिकायत या गुस्सा भी लोग नहीं करते है। अगर यह सोचा जाए कि वह व्यक्ति अगर एकएक रुपया करके शाम तक 100 लोगों को भी एक रुपया वापस नहीं लौटता है, तो शाम तक 100 रुपये हो गए और एक महीने में तीन हजार रुपये हो जाएंगे।

जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक ने बताया कि सरकारी रुपया कैसे भ्रष्टाचार के कारण नीचे तक पहुंचते-पहुंचते दस-पन्द्रह पैसे रह जाता है। लेकिन हम लोग अभी तक रुपये की कीमत को नहीं समझे है। वहीं योजना आयोग ने गरीबी के नए आंकड़े जारी किए है जिसमें गांवों में 27 और शहरों में 33 रुपये से कम कमाने वालों को गरीबों की श्रेणी में रखा है। दो सालों में सरकार ने गांवों और शहरों के लोगों की आमदनी में सिर्फ 1 रुपये की बढ़ोत्तरी की है। अब तो लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि एक रुपया कितना कीमती है।