बुधवार, 8 मई 2013

मीडिया में सुधार के लिए शोध जरुरी


          
यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट-2013 में खुलासा किया है कि भारत भले ही उभरती हुई अर्थव्यवस्था हो, लेकिन शोध के क्षेत्र में पाकिस्तान से भी पीछे है। जबकि भारत में शोध-कार्यों पर जीडीपी का 0.8 फीसदी खर्च किया जाता है, जो कि पाकिस्तान के खर्च से कहीं ज्यादा है। इससे एक बार फिर यह बात साफ हो जाती है कि विकास दर तो बढ़ रही है, लेकिन शोध कार्यों में हमारी स्थिति बेहतर नहीं है। मीडिया के क्षेत्र में तो शोध-कार्यों की स्थिति बदत्तर है।

 मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन मीडिया के चरित्र में आ रहे बदलाव के साथ  मीडिया में कई तरह की समस्याएं भी उभर कर सामने आई है। शोध कार्य ही एक मात्र जरिया है जिससे इन समस्याओं को समझने और उसे दूर करने के बारे में ठोस ढंग से बातचीत की जा सकती है। इस वजह से मीडिया के क्षेत्र में शोध का महत्व और भी बढ़ जाता है। समाज में शोध के महत्व को समझते हुए ही राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भी देश के विकास के लिए शोध-कार्यों को बढ़ावा देने की बात कही है।

मीडिया के क्षेत्र में छात्रों के शोध केवल डिग्री हासिल करने के उद्देश्य तक सिमट कर रह जाते है। उन शोधों से कुछ नया निकल कर नहीं आता है, कई बार एक ही प्रकार के शोध से विश्वविद्यलयों के पुस्तकालय भरे हुए हैं। एक तरह के शोधों में फर्क केवल शोध-शीर्षक भर का होता है। इससे जिस युवा अवस्था में विद्यार्थियों के पास सबसे उन्नत किस्म की उर्जा होती है, इस तरह के शोध करवाकर उनके समय और सार्वजनिक पैसों की बर्बादी की जाती है। इन शोध-कार्यों की न तो समाज में कोई उपयोगिता है। अभी तक मीडिया के क्षेत्र में अंग्रेजी में भले ही कुछ शोध मिल भी जाए, लेकिन हिंदी समेत भारतीय भाषाओं में बेहतर शोध मिलना मुश्किल है।

शोध संस्कृति को विकसित करने के उद्देश्य से मीडिया स्टडीज ग्रुप ने हाल के वर्षों में अपनी सक्रियता दिखाई है। बिना किसी संस्थान के सहायता के भी समाज के लिए उपयोगी शोध कैसे किए जा सकते हैं यह इस ग्रुप ने करके दिखाया है। एक वर्ष से ज्यादा समय हो गया जब ग्रुप ने हिन्दी में जन मीडिया और अंग्रेजी में मास मीडिया रिसर्च जर्नल भी प्रकाशित करने शुरू कर दिए है। इसका नारा है हमारा समाज हमारा शोध। इस समूह ने 2006 में मीडियाकर्मियों की सामाजिक पृष्ठभूमि का अध्ययन कर मीडिया में एक नई बहस को जन्म दिया, यह बहस आज भी चल रही है। इसके बाद मीडिया में देश भर में जिले स्तर पर मीडिया में सक्रिय महिलाओं को लेकर किए गए सर्वे ने तो मीडिया में महिलाओं की भागीदारी की वास्तविकता को सामने लाकर रख दिया। मीडिया में राज्यों और देश की राजधानी को छोड़ दें, तो जिले स्तर पर आधी आबादी का लगभग दो प्रतिशत के आसपास प्रतिनिधित्व है।

वहीं, एक सर्वे के मुताबिक प्रशिक्षित पत्रकारों में से एक चौथाई से ज्यादा पत्रकार पत्रकारिता को छोड़ चुके है, जो कि एक नये तरह के सवाल को सामने लाता है। जब प्रतिष्ठित संस्थानों के वेतनभोगी पत्रकारों की यह हालत है, तो अन्य पत्रकारों की स्थिति का भी अंदाज लगाया जा सकता है। पत्रकारों को केवल पत्रकारिता में केवल पैसे की ही जरूरत नहीं रहती है वह समाज में परिवर्तन में भी अपनी भूमिका इसके जरिये सुनिश्चत करने की कोशिश करता है। इस सर्वे से पत्रकारों और पत्रकारिता के संबंधों की स्थिति पर विचार-विमर्श शुरू हुआ। इसी तरह टीवी चैनलों पर होने वाली बहसों के अध्ययन में यह बात सामने आई कि कैसे चंद लोगों का ही बहसों पर एकाधिकार बना हुआ है। आपातकाल के दिनों में जिस तरह से एक छोटे से समूह का दूरदर्शन के स्टुडियों में कब्जा रहा है, उसी तरह से निजी चैनलों में भी छोटे से समूह का ही कब्जा है।

इसी तरह से डीडी उर्दू का अध्ययन, आकाशवाणीः बहुजन हिताय, सुखाय का अध्ययन, टीआरपी और निर्मल बाबा पर अध्ययन जैसे कई शोध कार्य मीडिया स्टडीज ग्रुप ने किए है। यह समूह शोध और अध्ययन के जरिए समाज को नई दिशा देने के लिए प्रयास करता रहता है।

आज जब प्रोफेनशल मीडिया अपने उद्देश्य से भटक गया और पत्रकारिता के मानकों का उल्लंघन कर रहा है। पेड न्यूज और क्रास मीडिया आनरशिप जैसी समस्या भी सामने आ रही है। इन समस्याओं से निपटने के लिए और मीडिया में सुधार के लिए शोध-कार्यों को बढ़ावा देना जरूरी है। शोध और अध्ययन के जरिए हमें मीडिया को समझने में आसानी होगी। 

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

बलात्कार की घटनाओं पर शर्म करें या बयानों पर



हरियाणा में  34 दिनों में 19 बलात्कार की घटनाएं हुई। इन घटनाओं ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि महिलाएं या लड़कियां कितनी सुरक्षित है। तो वहीं बलात्कार की घटनाओं पर आए बयानों से महिलाओं को लेकर हमारे समाज की सोच का भी पता चलता है।

कुछ माह पहले दिल्ली में हुई बलात्कार की एक घटना में जब पीड़िता की पुलिस ने पहचान उजागर की थी, तब तहलका ने अपने अप्रैल के अंक में बलात्कार के मामले में 30 पुलिसकर्मियों बात-चीत की, जिसमें से 17 पुलिसकर्मियों ने महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह और बलात्कार की शिकार लड़कियों के प्रति असंवदेनशीलता दिखाई। उस तहकीकत से एक बात ओर सामने आई थी कि लड़की को हमेशा ही दोषी ठहराने की कोशिश की जाती है।

 नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो(एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक पिछले सात साल में हरियाणा में बलात्कार की वारदातें दोगुनी  हुई हैं। 2004 में 386 बलात्कार दर्ज करने वाले राज्य में 2011 में बलात्कार की 733 घटनाएं सामने आई है।

अब जब हरियाणा में बलात्कार की घटनाएं थम नहीं रही है। इन घटनाओं पर आए बयानों पर गौर करें। सोनिया गांधी ने कहा कि रेप तो पूरे देश में हो रहे हैं। तो वहीं कांगेस नेता धर्मवीर गोयत ने बलात्कार के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराया है। दूसरी ओर खाप पंचायतें रेप की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए लड़कियों की शादी की उम्र को 18 से 16 साल करने की सलाह दे रही है, तो एक खाप नेता जितेंद्र छत्तर सिनेमा, संस्कृति और फास्टफूड को जिम्मेदार ठहरा रहे है। इन बयानों में कहीं भी सही मायने बलात्कार की घटनाओं को रोकने के लिए कोई अहम कदम उठाने की बात नहीं की गई है। जो खाप पंचायतं स्वयं को गांव और परंपरा का रखवाला बताती है या फिर वह नेता जिन्हें जनता चुनकर भेजती है, वह ऐसे बयान देंगे तो उनसे क्या उम्मीद की जा सकती हैं। इन बयानों में लड़की को ही दोषी ठहराया गया है। इसे सिर्फ पितृसत्तात्मक और सामंतवादी सोच का पता चलता है।

एक अन्य तर्क यह भी दिया जाता है कि लड़कियां भड़काऊ कपड़े पहनती है और मेकअप करती है, जिससे उनके साथ रेप होता है। ऐसे बेतुके तर्क देने के बजाए हमें मानसिकता को बदलना चाहिए। हम आधुनिक तो बन गए, लेकिन हम आज भी अपनी सोच को आधुनिक नहीं बना पाए।

 कैबिनेट ने जहां महिलाओं को अश्लील एसएमएस, एमएमएस और ई-मेल भेजने वाले कानून में संशोधन करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इसके तहत ऐसा करने वालों को पहली बार दो साल की कैद और 50 हजार का जुर्माना, दोबारा ऐसा करने वालों को सात साल सजा और एक से पांच लाख तक के जुर्माने की व्यवस्था की है। इसे भले ही महिलाओं को कुछ राहत मिले, लेकिन नेताओं के बलात्कार की घटनाओं पर आए बयानों से तो महिलाओं में असुरक्षा की भावना ही पैदा होगी। नेताओं को ऐसी बयानबाजी के बजाए बलात्कार की घटनाओं को रोकने के लिए कदम उठाने चाहिए। कानूनों को अमल में लाया जाना चाहिए। हमारे पुलिस तंत्र को भी इन घटनाओं में संवेदनशीलता दिखाने की आवश्यकता है।

सोमवार, 24 सितंबर 2012

हिन्दी की बढ़ती लोकप्रियता और हिन्दी का गिरता स्तर




एक बार फिर हिन्दी दिवस पर सैकड़ों आयोजन हुए। जिनमें हिन्दी के बढ़ते महत्व पर व्याख्यान दिए गए, तो कहीं हिन्दी की गिरावट पर चर्चा हुई। इसके बाद हम फिर पूरे साल हिन्दी की उपेक्षा करने लगेंगे ।

    हम अपनी भाषा की उपेक्षा क्यों करने लग जाते हैं, जबकि पश्चिमी देशों में हिन्दी पढ़ाए जाने पर हमें गर्व होता है। यह हिन्दी के लिए अच्छा है कि आज दुनिया के करीब 115 शिक्षण संस्थानों में  हिन्दी का अध्ययन हो रहा है। अमेरिका, जर्मनी में भी हिन्दी को पढ़ाया जा रहा है। हमें अन्य देशों से सिखना चाहिए कि कैसे वह अपनी भाषा के साथ ही अन्य भाषा को भी अपनाने की कोशिश करते हैं।
     एक ओर हिन्दी लोकप्रिय हो रही है, लेकिन वहीं हिन्दी का स्तर भी गिरता जा रहा है। हम हिन्दी की स्थिति को जानने के लिए अखबारों, न्यूज चैनलों का सहारा लेते हैं। आज हिन्दी अखबारों के भले ही करोड़ो पाठक है। जिससे यह कहा जाता है कि हिन्दी फल-फूल रही है, जबकि हिन्दी की स्थिति अच्छी नहीं है, क्योंकि आज अखबारों में हिंग्लिश शब्दों का प्रचलन बढ़ रहा है। वहीं हिन्दी अखबारों में से आज आई-नेक्सट जैसे समाचार पत्र भी निकल कर रहे हैं। जो न तो पूरी तरह से  हिन्दी और न ही पूरी तरह से अंग्रेजी है, जिसे युवा वर्ग काफी पसंद कर रहा है। हिन्दी अखबारों में कुछ अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग हो तो अच्छा है, लेकिन जब  हिन्दी के आसान शब्दों के स्थान पर भी अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग किया जाए, तो स्थिति चिंताजनक हो जाती है।
     यह भी कहा जाता है कि लोग मीडिया से अपनी भाषा बनाते हैं। ऐसे में जब हिन्दी के ही बड़े अखबार हिन्दी के एक ही शब्द को अलग-अलग तरीके से लिख रहे हो- जैसे- कोई अखबार सीबीआई को सीबीआइ, बैलेस्टिक को बलिस्टिक, टॉवर को टावर, कॉलोनी को कोलोनी लिख रहे हैं। ऐसे में जब पाठक मीडिया से अपनी भाषा तय करता है, तो पाठक सही गलत के फेर में उलझ जाता है। इन शब्दों को आज चाहे स्टाइल शीट के बहाने प्रयोग किया जा रहा है या फिर हिन्दी की मानक के शब्दों को भुलाने की कोशिश हो रही है।
     हिन्दी सिनेमा ने जहां हिन्दी के प्रसार में अहम भूमिका निभाई है। सिनेमा ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी हिन्दी को लोकप्रियता दिलाई है, लेकिन आज हिन्दी सिनेमा भी अंग्रेजी की गिरफ्त में आ गया है। आज हमारी फिल्म तो  हिन्दी है, लेकिन नाम अंग्रेजी है- जैसे वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई, गैंग्स आॅफ वासेपुर, देल्ही बेली, नॉटी एट फोर्टी है। ऐसे में क्या कहा जाए कि अब  हिन्दी मीडिया की तरह हिन्दी सिनेमा में भी अंग्रेजी शब्दों या हिंग्लिश भाषा का चलन बढ़ रहा है। इसके बाद कहीं हिन्दी के बजाए हिंग्लिश भाषा में फिल्में तो नहीं आने लगेंगी।
     अब बात करें स्कूली शिक्षा की तो इस बार यूपी बोर्ड में हिन्दी में सवा तीन लाख बच्चे फेल हो जाते हैं। यह चिंतनीय विषय है, क्योंकि इन बच्चों से ही  हिन्दी का भविष्य तय होगा। हिंदी में इतने बच्चों के फेल होने पर मीडिया में इस पर कोई खास चर्चा नहीं हुई।

   हिन्दी के गिरते स्तर को सुधारने की जरुरत है। हम जिस तरह अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने पर जोर देते हैं, उसी तरह हमें अपने बच्चों को  हिन्दी पढ़ाने पर भी जोर देना चाहिए। सरकार द्वारा भी प्राथमिक शिक्षा के माध्यम के तौर हिन्दी को बनाए रखना चाहिए। हमारे मीडिया को चाहिए कि वह भी हिन्दी की लोकप्रियता के साथ ही उसके स्तर पर भी ध्यान दें, वरना आने वाले समय आई-नेक्सट जैसे अखबारों की भरमार होगी।


बुधवार, 19 सितंबर 2012

न्यूड फोटोशूट: अश्लीलता या आजादी


 
पिछले कुछ समय से न्यूड होने का दौर चल पड़ा है। दिसंबर 2011 में वीना मलिक ने एफएचएम(FHM) पत्रिका के लिए न्यूड फोटोशूट करवाया। फिर कोलकाता नाइट राइडर्स के खिताब जीतने पर पूनम पांडे न्यूड हुई, तो वहीं शर्लिन चोपड़ा इंटरनेशनल एडल्ट मैगजीन प्लेब्वॉय के लिए न्यूड पोज देने वाली पहली भारतीय महिला बनी। इसके बाद शमिता शर्मा और अब टीवी एक्ट्रेस भी न्यूड होने से परहेज नहीं कर रही है। इन न्यूड फोटोशूट के बहाने अश्लीलता परोसी जा रही है। इसके लिए मीडिया भी अहम भूमिका निभाने से परहेज नहीं कर रहा है।

   शर्लिन चोपड़ा जिन्हें न्यूड होने पर गर्व  है। उनका मानना है कि मैगजीन के  लिए कपड़े उतारना खुद को रूढ़िवादी परंपरा से आजाद करने से कम नहीं हैं। इसे अब क्या यह मान लिया जाए कि महिलाओं को आजादी मिल गई है या फिर आजादी के नाम पर अश्लीलता परोसने का बहाना मात्र है। आज भी महिलाओं को जहां उनके अधिकार नहीं मिल सके है, तो वहीं कुछ महिलाएं न्यूड फोटोशूट करवाकर दैहिक स्वतंत्रता को मात्र देह में बदलना चाहती है। पहले विज्ञापन ने महिला को मात्र देह में बदलने की कोशिश की और अब न्यूड  फोटोशूटों के जरिए भी वहीं हो रहा।


 फिल्मों की अश्लीलता रोकने के लिए सेंसर बोर्ड ने निर्णय लिया है कि वह जिस फिल्म को एडल्ट सर्टिफिकेट देगा, उनका अब किसी तरह टीवी पर प्रदर्शन लगभग असंभव हो जाएगा। इस अश्लीलता पर तो सेंसर बोर्ड रोक लगने की कोशिश कर रहा है, लेकिन न्यूड फोटोशूट के जरिए जो अश्लीलता हमारा मीडिया खबरों के माध्यम से परोस रहा है उसका क्या। मीडिया न्यूड फोटोशूट की खबरों को बड़ी प्रमुखता से पेश कर रहा है। इन फोटोशूट से जहां हमारी संस्कृति प्रभावित हो रही है, वहीं महिलाओं की आजादी का दायरा सीमित होने का खतरा भी हैं।


 अब हमें समझना होगा कि ये फोटोशूट सिर्फ कुछ मॉडलों के लिए मात्र नाम और पैसा कमाने का जरिए हैं, न कि महिलाओं की आजादी।  ऐसे में मीडिया को भी इन फोटोशूटों को ज्यादा तवज्जों नहीं देनी चाहिए, जिससे सस्ती लोकप्रियता की भूखी मॉडलों को भी बढ़ावा न मिलें।  



मंगलवार, 28 अगस्त 2012

टीआरपी व्यवस्था पर फिर खड़े हुए सवाल




इन दिनों एक बार फिर टैम की टीआरपी तय करने की व्यवस्था पर फिर सवाल उठने लगे है। टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वांइट) की व्यवस्था पर मीडिया आलोचक शुरू से ही सवाल उठाते रहे है, लेकिन इस बार टैम पर टीआरपी तय करने में धोखाधड़ी का आरोप एनडीटीवी चैनल ने लगाया है। एनडीटीवी 2004 से 2012 तक की टीआरपी से नाखुश है। इसको लेकर उसने न्यूयॉर्क स्टेट लॉ के तहत निल्सन और कंटर मीडिया कंपनी पर मुकदमा दर्ज कराया है। वहीं, प्रसार भारती भी अब टीआरपी में दूरदर्शन के दर्शकों की अनदेखी को लेकर चिंतित है। ज्ञात हो कि टीआरपी की शुरुआत 1993 में हुई थी।  विज्ञापन को ध्यान में रखते हुए ही टीआरपी नामक व्यवस्था शुरु की गई थी।

     टीआरपी पर ही चैनलों का धंधा टिका हुआ है। टीआरपी के माध्यम से ही तय होता है कि किस चैनल या किस कार्यक्रम को कितने समय तक देखा गया है। जिस चैनल की टीआरपी हाई होगी, उसी को विज्ञापन मिलता है। आज चैनल टीआरपी पाने के लिए खबरों को सनसनीखेज बनाने और हल्का बनाने से भी परहेज नहीं कर रहे है। टीआरपी की इस अंधी दौड़ में चैनल्स पत्रकारिता के एथिक्स को भूलते जा रहे हैं। दूरदर्शन भी इस होड़ में फं सा है, वह भी निजी से अलग कुछ नहीं कर पा रहा है।

      इस व्यवस्था में कई खामियों के बावजूद भी चैनलों का धंधा इसी पर टिका है। तो वहीं आज यह व्यवस्था ही पत्रकारिता की दुश्मन बन गई है, क्योंकि टीआरपी पर टैम का एकाधिकार बना हुआ है। टैम सप्ताह में एक बार टीआरपी तय करता है। टीआरपी तय करने के लिए टैम ने केवल सात हजार मीटर लगाएं है, जिनकी पारदर्शिता पर कई  बार सवाल उठते रहे हैं। किसी घर में दो मीटर लगे हैं, तो किसी में एक भी नहीं। एक अनुमान के मुताबिक 12 करोड़ घरों में टेलीविजन है, इसमें से लगभग 6.2 करोड़ टीवी गांवों में लगे है। इन गांवों को टीआरपी के इस खेल में शामिल नहीं किया जाता है। सिर्फ कुछ प्रमुख महानगरों की टीआरपी को ही देश के लोगोें की पसंद और नापसंद बनाया जाता है। जिसमें पूर्वोत्तर क्षेत्र को भी शामिल नहीं किया गया है।

    प्रसार भारती ने भी 2003-04 में टीआरपी की इस व्यवस्था को सही नहीं बताते हुए टैम से मीटर कोे बढ़ने का अनुरोध किया था, लेकिन इसके लिए टैम ने दूरदर्शन से ही पौने आठ करोड़ की मांग की थी। इसको लेकर दूरदर्शन ने कहा कि टीआरपी व्यवस्था सभी चैनल्स के लिए इसलिए वह अकेले पैसे इसका भार नहीं उठाएगा। वहीं, चैनल के संचालक भी मीटर बढ़ाने के पक्ष में नहीं नजर आ रहे है, क्योंकि इससे उनके हितों की पूर्ति नहीं हो पाएगी। टैम ने मीटर की संख्या बढ़ाकर 30,000 करने को कहा था, लेकिन आज उन 7000 हजार मीटरों से टीआरपी तय हो रही है।

टैम की इस व्यवस्था को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसमें कितनी खामियां है, तो वहीं पारदर्शिता के अ•ााव में टीआरपी से छेड़छाड़ की सं•ाावना बढ़ जाती है। एनडीटीवी के अधिकारियों से टैम के साथ काम करने वाले कुछ कर्मचारियों ने पैसे खर्च कर मीटर वाले घरों को प्र•ाावित करने की बात कहीं।

 अब देखना यह है कि एनडीटीवी के इस मुकदमे से टीआरपी की व्यवस्था में कुछ बदलाव आएगा या टीआरपी की व्यवस्था पर टैम का ही एकाधिकार रहेगा। फिलहाल तो यहीं उम्मीद की जा सकती है कि इस मामले से टैम का कोई विकल्प निकलकर आए, ताकि टीआरपी सिर्फ विज्ञापनदाताओं को ही न देख बल्कि दर्शक के हितों का भी ध्यान रखा जाए।


शनिवार, 14 जुलाई 2012

क्यों लोग लगा रहे हैं मौत को गले


              
    राष्ट्रीय अपराध रिकॉडर््स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों और द लैंसेट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक  वर्ष 2011 में भारत में 1 लाख 35 हजार से ज्यादा लोगों ने आत्महत्या की।  भारत में हर घंटे औसतन 16 लोगों ने मौत को गले लगाया है, जबकि  2010 में आत्महत्या करने वालों की संख्या 1 लाख 34 हजार से ज्यादा थी। साल दर साल आत्महत्या करने वाले लोगों की संख्या में इजाफा होता जा रहा है।

    इस रिपोर्ट के अनुसार परिवहन हादसों के बाद आत्महत्या लोगों में मौत का दूसरा बड़ा कारण है।  मौत को गले लगाने में सबसे ज्यादा 15 से 29 वर्ष के युवा है। भारत में 48 हजार से ज्यादा युवाओं ने आत्महत्या की, तो वहीं आत्महत्या करने वाले पांच लोगों में एक गृहिणी है।

    कुछ समय से कहा जा रहा है कि आने वाले कुछ सालों में भारत सबसे ज्यादा युवाओं वाला देश होगा , लेकिन युवा ऐसे ही मौत को गले लगाते रहे, भारत के युवा देश होने का सपना टूट जाएगा।

    अगर आत्महत्या के कारणों पर सोचा जाए तो इसका मुख्य कारण आज की बदलती जीवन शैली और अकेले रहने की प्रवृत्ति को कहा जा सकता है। अकेले रहने की प्रवृत्ति से लोग तनावग्रस्त और अवसाद का शिकार हो रहे है और मौत को गले लगा रहे है। वहीं, आज के युवाओं की जो महत्वकांक्षाएं  है, उन्हें पूरा करने के लिए उनके पास अवसर नहीं है , जिससे वह  जिंदगी से हताश हो रहे है।

    एक अन्य कारण पारिवारिक समस्याएं भी है। जिस तरह आज हमारे परिवार टूट रहे, कलह बढ़ रहा, इससे भी लोग आत्महत्या करने को विवश हो रहे है।

   आत्महत्या के इन आंकड़ों पर गौर करने की जरुरत है, ताकि इन आंकड़ों में बढ़ोतरी न हो और हमारे देश के युवा आत्महत्या करने से बचे, वरना युवाओं के देश और आर्थिक महाशक्ति का सपना कहीं टूट न जाएं।

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

कैसी जल नीति



राष्ट्रीय जल नीति ड्राफ्ट 2012 में सरकार जल का निजीकरण करने और जल को आर्थिक वस्तु बनाने पर तुली है। जल के रख-रखाव और वितरण के लिए सार्वजनिक निजी साझेदारी (पीपीपी मॉडल) को अपनाने की योजना बनाई गई है।
     जल एक प्राकृतिक संसाधन है। जिस पर हर वर्ग का अधिकार है, लेकिन अब यह प्राकृतिक संसाधन कुछ प्रभावशाली लोगों और निजी कंपनी तक ही सिमट जाएगा। पिछले एक दशक से जिस तरह पानी माफिया बढ़ रहा है और मुनाफा कमा रहा है। नई जल नीति से पानी माफियों को और बढ़ावा मिलेगा।
     नई नीति में जल से अधिकतम लाभ कमाने का उद्देश्य रखा गया है और इसमें बिजली और पानी दोनों को महंगा करने को भी कहा गया हैै, ताकि इनका दुरुपयोग कम हो सकें। इस नीति के तहत सरकार की भूमिका केवल नियमन तक सीमित रहेगी। वहीं, एक स्वायत्त इकाई का गठन भी किया जाएगा, जो जल कंपनी के लिए लागत और उचित लाभ मुक्त मूल्य निर्धारित करेगी। यह स्वायत्त इकाई जनदबाव और सरकारी नियंत्रण से मुक्त होगी।
      इन प्रावधानों को देखकर कहा जा सकता है कि सरकार अब जल को मुनाफे की वस्तु के तौर पर देख रही है, जो सही नहीं है। जल के निजीकरण के पीछे सरकार का तर्क है कि जैसे बिजली की हालत में सुधार आया है और बिजली का दुरुपयोग कम हुआ है। वैसे ही अब जल की हालत में भी सुधार आयेगा। क्या सिर्फ जल के निजीकरण और कीमतों को बढ़ाकर ही पानी के दुरुपयोग को रोका जा सकता है। जबकि हकीकत तो यह है कि जो प्रभावशाली तबका है, वहीं जल का दुरुपयोग कर रहा है और वह कीमतें बढ़ने के भी जल की कीमत को नहीं समझेगा। क्योंकि जो दूसरा तबका है, उसे इतना जल मुहैया ही नहीं हो पा रहा है कि वह जल का दुरुपयोग कर पाए। ऐसे में जब जल की कीमतें और बढ़ जाएंगी, तो उसे जल से पूरी तरह वंचित होना पड़ेगा, जोकि मानवाधिकारों का हनन है। जल को हर तबके को उपलब्ध करना सरकार का दायित्व है। जल को केवल वस्तु नहीं माना जा सकता, यह जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है।
     वहीं, जब स्वायत्त इकाई जनदबाव और सरकारी नियंत्रण से मुक्त रहेगी, तो मनमर्जी से कीमतों में बढ़ोतरी की जाएगी जैसे आज बिजली के क्षेत्र में हो रहा है, एक तरफ बिजली कंपनियां घाटा दिखती है, जबकि उन्हें मुनाफा हो रहा है।
    इस ड्राफ्ट के बाद अभी हाल ही में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि एक से डेढ़ साल में निजीकरण की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। तो वहीं पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर मालवीय नगर, वसंत विहार और नरेला में मीटर रीडिंग व बिलिंग का काम पहले ही निजी हाथों में सौंपा जा चुका हैं। यानि जल निजीकरण की प्रक्रिया को अंजाम देने की पूरी तैयारियां कर ली गई है।
    जल के निजीकरण से असमानता बढ़ेगी और जल गरीब तबके की पहुंच से दूर हो जाएगा। अब जल का उपयोग वहीं कर पायेगा, जो उसकी कीमत चुका पायेगा और जल के निजीकरण की मार सबसे ज्यादा उस किसान पर पड़ेगी, जो पहले ही फसल की लागत भी नहीं निकाल पाता है। अब उस किसान के लिए खेती और महंगी होगी।