बुधवार, 14 अगस्त 2013

सरकार के विज्ञापनों में विकास दिखता है



भाईया दिल्ली में चुनाव होने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। इसलिए दिल्ली सरकार अपनी उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है। सरकार ने बस स्टैडों को विकास की उपलब्धियों वाले विज्ञापनों से पाट दिया है। विज्ञापनों में सरकार कह रही है कि देखो जनता, पिछले दस सालों में हमने कितना विकास किया। सच है, भई विज्ञापनों के आंकड़ों में तो विकास दिख ही रहा है। खैर, इन विज्ञापनों से बस स्टैंडों का विकास भी हो ही गया। रात में बिजली की चमक से चमकते सरकार की उपलब्धियों के इन विज्ञापनों से मानो ऐसा लगता है जैसे हर तरफ विकास ही विकास हो रहा है।
यह तो हुई सरकार के विज्ञापनों में विकास की बात। अब बात कर लें उस विकास की, जिसे सरकार शायद बताने में हिचक  रही है। वह विकास है, अपराध के ग्राफ का ऊपर की ओर बढ़ना। भई, जैसे सरकार विज्ञापनों में आंकड़ों के बढ़ने को विकास बता रही तो भला अपराध के आंकड़े भी तो बढ़े हैं, फिर उन्हें विकास बताने से परहेज क्यों। सरकार को वोट चाहिए और वोट, अपराध के विकास को बताने से तो कतई नहीं मिलेंगे। सरकार बता रही है कि अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या बढ़ गई, बिजली ग्राहकों की संख्या बढ़ गई और फ्लाईओवर भी पहले के मुकाबले बढ़ गए है और न जाने क्या-क्या।   
लगता है कि सरकार शायद ये भूल गई है कि लापता बच्चों की संख्या भी बढ़ती जा रही है, बलात्कार के मामले भी बढ़ रहे हैं और झपटमारी की घटनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। और तो और दिल्ली के तालाब भी अब पहले के मुकाबले ज्यादा सूखते जा रहे। मीड-डे मील के 100 से 88 नमूने फेल हो रहे हैं। भई एक बात अब मान ही लेनी चाहिए कि चौतरफा विकास ही विकास है और कुछ नहीं। चाहे सरकार के विकास के बढ़ते आंकड़े या फिर क्राइम की रिपोर्ट के बढ़ते आंकड़े या मीड-डे मील के फेल होने वाले नमूनों की बढ़ती संख्या देख लीजिए। इन सब में विकास  ही नजर आएगा और कुछ नहीं।
जनता कहती रहती है कि विकास नहीं हो रहा है, भई यहां तो विकास ही विकास हो रहा है। फिर क्यों जनता कहती है कि विकास नहीं हो रहा। शायद जनता अभी तक सरकार के आंकड़ों वाले विज्ञापनों को समझ ही नहीं पाई। खैर, कोई बात नहीं अभी चुनाव में कुछ समय है, तब तक जनता भी रोजाना इन विज्ञापनों को देखकर समझ ही जाएगी कि विकास हो रहा है।
                






बुधवार, 3 जुलाई 2013

शिक्षा संस्थानों को बाजार के हवाले करने का विरोध है

शिक्षा के बाजारीकरण पर चिंता जताते हुए दो दशक पहले शिक्षा विभाग के अध्यक्ष कृष्ण कुमार ने एक लेख में लिखा था कि हमारे देश में दो तरह के स्कूल बन रहे है। पहली किस्म का स्कूल जिसे उन्होंने खुला स्कूल कहा, जिसमें हरेक बच्चे को कई तरह की सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से आने वाले बच्चों से संबंध बनाने का मौका देता है। दूसरी तरफ फीस देने की क्षमता या तथाकथित योग्यता के आधार पर बच्चों को चुनने वाला स्कूल, जिसे उन्होंने बंद स्कूल कहा था। तब से लेकर अब तक हमारे देश में दो तरह के स्कूलों का विकास होता गया और आज शिक्षा के ढांचे को केवल बाजार की जरुरत के अनुसार खड़ा करने की कोशिश हो रही है। जबकि शिक्षा से व्यक्ति का राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास जुड़ा होता है। इस कारण सिर्फ बाजार की जरुरत के अनुसार शिक्षा का ढांचा खड़ा करने से क्या व्यक्ति का पूर्णतः विकास हो पायेगा। वहीं इससे शिक्षा के स्तर में भी गिरावट आएगी। बाजार के अनुरुप शिक्षा का ढांचा खड़ा करके हम सिर्फ कामगार लोगों की संख्या जरूर बढ़ा लेगें, लेकिन जागरूक नागरिक नहीं बना पायेंगे।
दिल्ली विश्वविद्यालय में चार वर्षीय कोर्स की शुरुआत भले ही अब हुई है, लेकिन इसकी शुरुआत तो तभी हो गई थी जब हमारे स्कूलों में कक्षा आठवीं तक बिना किसी परीक्षा या मूल्यांकन के विद्यार्थी को अगली कक्षा में भेजने की अनिवार्यता दे दी गई थी। इससे शिक्षितों के आंकड़े तो बढ़े लेकिन बुनियादी शिक्षा का स्तर भी गिरता गया है। स्थिति यह है कि कक्षा पांचवी का छात्र दूसरी कक्षा की किताबें नहीं पढ़ पाता है। अब दिल्ली विश्वविद्यालय ने स्नातक स्तर पर बुनियादी कोर्स के नाम पर फाउंडेशन कोर्स पढ़ाने की राह निकाल ली है। वहीं अब सीबीएसई भी आठवीं के बाद व्यावसायिक पाठ्यक्रम को पढ़ाने की योजना बना रहा है। सवाल शिक्षा का स्तर बनाम बाजार के अनुरुप शैक्षणिक संस्थानों का ढांचा खड़ा करने की योजना से जुड़ा है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में काफी गहमा-गहमी के बाद चार वर्षीय कोर्स लागू कर दिया। लेकिन अभी भी इस कोर्स को लेकर विरोध थमता नजर नहीं आ रहा है। बुनियादी तौर पर ये तीन वर्ष के कोर्स को चार वर्ष में बदलने से नहीं जुड़ा है और ना ही चार वर्ष के कोर्स का ही विरोध करने तक सीमित है। बुनियादी तौर पर विरोध में वह चिंता शामिल है जिसमें बाजार को ध्यान में रखकर पढ़ाई लिखाई का ढांचा व वातावरण विकसित किया जा रहा है। इस चार वर्षीय कोर्स में चार तरह के कोर्स छात्रों को पढ़ाए जाएंगें जिसमें पहला फाउंडेशन कोर्स यानी बुनियादी पाठ्यक्रम। इसमें 11 पेपर होंगे। यह पेपर आटर्स, साइंस और कॉमर्स के सभी छात्र-छात्राओं के लिए अनिवार्य है। दूसरा डिसिप्लिन वन है, यह मुख्य कोर्स है। तीसरा डिसिप्लिन टू है, इसमें डिसिप्लिन वन के सहायक पेपर पढ़ाए जाएंगे। चौथा एप्लाइड कोर्स है, यह स्किल ( दक्षता या कौशलता ) आधारित कोर्स है। चार वर्षीय कोर्स भले ही एक नजर में अच्छा लगे, लेकिन इसमें खामियों की पड़ताल एक बुनियादी जरूरत है। इस कोर्स को लागू करते हुए यह कहा जा रहा है कि कोर्स छात्र-छात्राओं के हित में है और इससे छात्र-छात्राओं को रोजगार के अधिक अवसर मिलेंगे। डीयू के कुलपति दिनेश सिंह का भी कहना है कि कोर्स तैयार करने में बाजार का ध्यान रखा गया है और साथ ही इसमें व्यावहारिक ज्ञान पर ज्यादा जोर दिया गया है। यह तो हम सभी जानते है कि काफी समय से उच्च शिक्षा में सुधार को लेकर चर्चा हो रही है, लेकिन क्या सिर्फ स्नातक की डिग्री को चार साल का करने देने से उच्च शिक्षा में सुधार हो जाएगा ?  सुधार की प्रक्रिया पहले प्राथमिक स्तर पर शुरू होनी चाहिए। यदि वास्तव में मंशा लोकतंत्र के अनुरूप शिक्षा के ढांचे को खड़ा करने की है।

जब पहले ही छात्र-छात्राएं 12 वीं कक्षा तक तमाम विषयों के बारे में परिचयात्मक ज्ञान हासिल कर लेते है और आगे की पढ़ाई अपनी विषय रुचि के अनुसार करते रहे है। तो उन्हें स्नातक स्तर पर बुनियादी विषय को थोपने की दलील समझ से परे हैं। वहीं इस कोर्स को पढ़ाने के लिए पर्याप्त संख्या में शिक्षक भी नहीं है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी रिक्त पदों को लेकर चिंता जाहिर की है। वहीं अगर पाठ्यक्रम की बात करें, कहा जा रहा है कि इसकी चार साल से तैयारी चल रही थी। लेकिन सवाल यह है कि चार साल की तैयारी के बाद भी कोर्स डीयू के प्रोस्पेक्ट्स से गायब क्यों है। प्रोस्पेक्ट्सों में कोर्स का न होना भी चार वर्षीय पाठ्यक्रम की हड़बड़ी बताता है। 

एक और नई सिफारिश यह है कि अब छात्रों को सभी प्रश्नपत्रों को मिलाकर 45 फीसदी अंक लाने होंगे। इसका मतलब यह है कि किसी छात्र को अगर एक पेपर में 20 अंक भी मिलते है, तब भी उसे डिग्री मिल जाएगी। इस सिफारिश से कोर्स को लेकर विरोधाभास की स्थिति नजर आ रही है। इस कोर्स के जरिये बाजार के अनुरूप शैक्षणिक संस्थानों को ही खड़ा करना भर नहीं है। दरअसल शैक्षणिक संस्थान पूरी राजनीतिक व्यवस्था के ही हिस्से होते है। एक संकट ये खड़ा हो रहा है कि बेरोजगारी के आंकड़ें बेतहाशा बढ़ रहे हैं। इस तरह के कोर्स से उन आंकड़ों के ग्राफ्स और गति को कमतर दिखाया जा सकता है। एक सरल सा तर्क है कि जो स्नातक की डिग्रीधारी पहले तीन वर्षों के बाद नौकरी मांगते थे अब वे चार वर्ष में ही नौकरियों के लिए मार्केट में हकदार हो सकते हैं।

डीयू के चार वर्षीय पाठ्यक्रम लागू करने से जहां शिक्षा प्रणाली दो तरह की हो जाएगी। वहीं डीयू के छात्रों को अन्य विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएशन करने के लिए दो साल का ही समय देने होगा। इस कोर्स से समय और पैसे दोनों की बर्बादी होगी। यह शिक्षा के बाजार के हित में है। इससे निजी शिक्षा संस्थानों को लाभ मिलेगा।अब छात्र डिप्लोमा करने के बाद ही नौकरी के लिए दौड़ने लगेंगे। जितने ज्यादा लोग नौकरी के लिए दौड़ते है वह स्थिति बाजार के हित में होती है। वहीं डिग्रीधारी छात्र से डिप्लोमा धारी छात्र का आत्मविश्वास भी कम होगा। शिक्षा के बदलाव से बाजार का विकास होगा, व्यक्ति का विकास नहीं हो पाएगा।
 


मंगलवार, 25 जून 2013

छात्रवृत्ति से वंचित रखने के विचार की पहचान

                                                             
अभी कुछ समय पहले ही राजीव गांधी राष्ट्रीय फेलोशिप की योजना के लिए 125 करोड़ रुपये के आवंटन को घटाकर 25 करोड़ कर दिया है। इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को जिम्मेदार ठहराया गया है। यह फेलोशिप अनुसूचित जाति के छात्र-छात्राओं को वित्तीय सहायता देकर उन्हें सशक्त बनाने के लिए है। इसका कारण यह बताया जा रहा है कि यूजीसी ने न तो लाभार्थियों की सूची पेश की और न ही पिछले वर्षों के 150 करोड़ रुपये के उपयोगिता प्रमाणपत्र पेश किए। ऐसा सिर्फ इस फेलोशिप या छात्रवृत्ति के साथ नहीं है। बल्कि उच्च शिक्षा के स्तर पर देखे तो पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के तहत केंद्र सरकार एससी, एसटी, ओबीसी और माइनॉरटी के छात्र-छात्राओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाकर उनकी उच्च शिक्षा में भागीदार को बढ़ाना चाहती है, लेकिन ऐसा पूर्ण रूप से नहीं हो पा रहा है। यहां भी उसी जटिल प्रक्रिया के नाम पर छात्रों को वर्ष के अंत में छात्रवृत्ति मिलती है या कभी-कभी मिलती ही नहीं है।

इसका एक उदाहरण दिल्ली विश्वविद्यालय का अदिति कॉलेज है। कॉलेज की छात्राओं ने आरटीआई का उपयोग कर छात्रवृत्ति संबंधी कुछ सूचनाएं जुटाई। जिसमें यह जानकारी मिली कि 2011-12 में 102 छात्राओं ने ही छात्रवृत्ति के लिए आवेदन किए, जबकि छात्रवृत्ति योग्य छात्राओं की संख्या 207 है। इससे यह पता चलता है कि 95 छात्राओं को छात्रवृत्ति संबंधी की जानकारी ही नहीं मिली या किसी कारण से वह आवेदन नहीं कर सकी। आवेदन करने वाली 102 छात्राओं में से किसी को भी छात्रवृत्ति नहीं मिली है। तब तीन छात्राओं ने आवेदन भरने के बाद भी छात्रवृत्ति न मिलने का कारण जानना चाहा, तब उन्हें बताया गया कि उनके फार्मों में त्रुटियां थी। वहीं, जब छात्रसंघ की अध्यक्ष आरटीआई के माध्यम से छात्रवृत्ति संबंधी जानकारी मांगती है, तो यह बताया जाता है कि फार्म जमा ही नहीं हुए। इन सब बातों को देखकर लगता है कि इस कॉलेज में या तो घोर लापरवाही बरती जा रही या मामला कुछ ओर ही है। इसमें कॉलेज प्रशासन की लापरवाही तो साफ नजर आ रही है। वहीं, एक छात्रा के पिता द्वारा वाइस चासंलर से इस संबंध में दो बार शिकायतें करने के बाद भी इस मामले पर कोई कार्रवाई न होना यह दर्शाता है कि विश्वविद्यालय भी इस मामले की उपेक्षा कर रहा है।

दरअसल दिल्ली विश्वविद्यालय और उसके एक अदिति कॉलेज के इस वृतातं को महज एक उदाहरण के रूप में देखना चाहिए। आमतौर पर एससी, एसटी, ओबीसी और माइनॉरटी छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति मुहैया नहीं हो पाने की स्थितियां तैयार करना एक साजिश के तौर पर दिखता है।वर्चस्ववाद एक विचार और वह समय और स्थितियों के अनुसार वंचितों को वंचित बनाए रखने के रूप तैयार करता है। आज के दौर में छात्रवृति से वंचित रखना पहले शिक्षा से दूर रखने के ही बराबर है।   गौरतलब है कि इस छात्रवृत्ति से सिर्फ इन छात्र-छात्राओं को आर्थिक मदद ही नहीं मिलती, बल्कि इनको अपने आप को सशक्त बनाने में भी मदद मिलती है।जहां छात्रवृत्ति  मिल जाती है वहां यह छात्र-छात्राएं उच्च शिक्षा हासिल कर लेते हैं। डा. भीम राव आम्बेडकर को मदद नहीं मिलती तो वे भी आज बतौर संविधान निर्माता हमारे सामने नहीं होते। यदि किसी एक भी छात्र को छात्रवृत्ति न मिले, तब उनकी मनोदशा का अंदाजा हम लगा सकते। आदिवासियों की दशा दिशा पर लिखते हुए रमणिका गुप्ता अपनी पुस्तक आदिवासी अस्मिता का संकट में भी बताती है कि सरकार वजीफा देती है आदिवासी छात्रों को, लेकिन आधा पैसा वितरण करने वाला रख लेता है और जो मिलता है, वह इतनी देर से कि उसका उपयोग पढ़ाई की जगह, दूसरी जगह हो जाता है।यानी दिल्ली और सुदूर आदिवासी इलाकों में एक ही तरह के विचार किन किन रूपों में सक्रिय हैं, इसकी थाह ली जा सकती है।

एक कॉलेज जब वाजिफे से वंचित करता है तो वह  दिन दूर नहीं होता है जब कॉलेज की छात्रवृत्ति में भी कटौती कर दी जाती है। राजीव गांधी छात्रवृति का उदाहरण सामने हैं। अब इसमें छात्राओं का क्या दोष है। दरअसल ये वर्चस्वादी विचार की सक्रियता है जो प्रशासन की लापरहवाही और  गलती के रूप में दिखती है और सजा छात्राओं को भुगतनी पड़ेगी। इस प्रकार की छात्रवृत्तियां इन छात्रों को प्राथमिक शिक्षा के स्तर से ही दी जाती है। ताकि आर्थिक रूप से कमजोर छात्र शिक्षा से वंचित न हो सके।

मजेदार बात है कि दिल्ली विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा को अधिकाधिक छात्रों तक पहुंचाने के लिए फीस माफी योजना बनाए जाने का प्रचार कर रहा है। इसके तहत अनूसचित जाति और जनजाति के साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर तबके के छात्रों की फीस भी माफ करेगा।लेकिन सवाल यह है कि जब पहले से मौजूद योजनाओं से छात्रों को वंचित रखने के विचार सक्रिय हो और उसे संरक्षण भी मिलता दिख रहा हो तो  इस नई योजना से क्या उम्मीद की जा सकती है। इस योजना को लाभकारी बनाने के लिए यह सुनिश्चित करना भी जरुरी है कि उन छात्रों को पर्याप्त मदद मिले, जो इसके योग्य हो।

                                                                                                                         संजय कुमार

सोमवार, 3 जून 2013

महिलाओं की अनदेखी करता है आकाशवाणी

-संजय कुमार

"...मीडिया स्टडीज ग्रुप के इस सर्वे में रेडियो के सर्वाधिक प्रसार और सुने जाने वाले चैनल आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण केंद्र से एक वर्ष के दौरान प्रसारित हुए 527 कार्यक्रम और उनमें विशेषज्ञ के तौर पर बुलाए गए 244 लोगों को विश्लेषण के तौर पर पेश किया गया। सर्वे बताता है कि कैसे आकाशवाणी के कार्यक्रमों से महिलाएं और ग्रामीण महिलाएं गायब होती जा रही है।..."


निजी एफएम चैनलों से होड़ करते हुए आकाशवाणी ने व्यापक बदलाव का मन बना लिया है। आकाशवाणी के इस बदलाव में युवाओं को लुभाना और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करना शामिल है। लेकिन आकाशवाणी के इस बदलाव ने अपने कई पारंपरिक श्रोताओं और प्राथमिकताओं को भी बदल दिया है। मसलन आकाशवाणी की ताकत भारत के ग्रामीण समाज और खासकर घरों में रहने वाली महिलाओं से है, लेकिन वह राष्ट्रीय स्तर पर आकाशवाणी के कार्यक्रमों से गायब हो रहा है।
 
अभी हाल ही में मीडिया स्टडीज ग्रुप ने अपने सर्वे में खुलासा किया कि कैसे महिलाएं और खासकर ग्रामीण महिलाएं आकाशवाणी के दायरे से बाहर हो रही हैं। ग्रुप की ओर से विजय प्रताप द्वारा किए गए इस सर्वे को संचार और मीडिया की शोध पत्रिका जन मीडिया ने अपने मई, 2013 अंक में प्रकाशित किया है। इस सर्वे के अनुसार एक वर्ष के दौरान आकाशवाणी में राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं पर केंद्रित केवल 1.52 प्रतिशत कार्यक्रम ही पेश किए गए। ये कार्यक्रम भी शहरी पृष्ठभूमि की महिलाओं के इर्द-गिर्द केंद्रित रहे। आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण केंद्र द्वारा महिलाओं पर केंद्रित कार्यक्रमों का अध्ययन करने के लिए इस समूह ने सूचना का अधिकार (2005) के तहत आवेदन के जरिये सूचनाएं एकत्रित की। मीडिया स्टडीज ग्रुप के इस सर्वे में रेडियो के सर्वाधिक प्रसार और सुने जाने वाले चैनल आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण केंद्र से एक वर्ष के दौरान प्रसारित हुए 527 कार्यक्रम और उनमें विशेषज्ञ के तौर पर बुलाए गए 244 लोगों को विश्लेषण के तौर पर पेश किया गया। सर्वे बताता है कि कैसे आकाशवाणी के कार्यक्रमों से महिलाएं और ग्रामीण महिलाएं गायब होती जा रही है।

आकाशवाणी का दावा है कि राष्ट्रीय लोक प्रसारक के रूप में वह सभी वर्ग के लोगों को सशक्त बनाने को वचनबध्द है। लेकिन यह तभी मुमकिन है जब सामाजिक दायित्व को ध्यान में रखकर आकाशवाणी पर प्रसारित किए जाने वाले अपने कार्यक्रमों को तैयार करे। कहा जाता है कि आकाशवाणी बहुजन हितायबहुजन सुखाय के अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिये कार्यरत है। इसकी पहुंच देश के 92% क्षेत्र और कुल जनसंख्या के 99.18% तक है।

निजी समाचार माध्यम शहरी और बहुसांकृतिक महानगरों (कॉस्मोपॉलिटन) की आबादी को अपना लक्षित समूह निर्धारित कर चुके हैं। इस स्थिति में देश के दूर दराज के इलाकों में रहने वाली आबादी की आकाशवाणी से ज्यादा अपेक्षा रहती है। जिसके जरिए वह अपनी समस्याओं और तकलीफ की वजहों को जानना व उसे साझा करना चाहेंगे। मगर आकाशवाणी में आयोजित कार्यक्रमों के विषय वस्तुओं में महिला, किसान, दलित-आदिवासी और पिछड़े व अल्पसंख्यक समाज के सवालों का अभाव दिखता है। इस अध्ययन के अनुसार यह चिंता ना तो केवल भारत की है और ना ही अभी की है, बल्कि महिलाओं के साथ भेदभाव का यह सिलसिला निरंतर चला आ रहा है। बीजिंग में हुए चौथे वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस ऑफ वुमेन (1995) में मीडिया द्वारा महिलाओं के रुढ़िवादी छवि पेश किए जाने के संबंध में कहा था कि अभी भी कुछ श्रेणियों की महिलाएं मसलन गरीब, असहाय या वृद्ध महिलाएं जो अल्पसंख्य तबकों या जातिय समूहों से ताल्लुक रखती हैं, मीडिया से पूरी तरह गायब हैं। मीडिया में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर भारत में प्रथम प्रेस आयोग (1954) और द्वितिय प्रेस आयोग (1980) ने चिंता जाहिर की थी। दूसरे प्रेस आयोग द्वारा 1980 में कराए गए सर्वे में बताया गया कि दक्षिण भारत में कुल पत्रकारों में केवल 3 प्रतिशत ही महिलाएं हैं। मीडिया स्टडीज ग्रुप के 2012 में किए गए सर्वे में भी यह बात सामने आई है कि भारतीय समाचार मीडिया में महिलाओं की संख्या केवल 2.7 प्रतिशत है। भारत में महिलाओं की आबादी करीब 49.65 करोड़ है, जिसमें ग्रामीण महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 72.7 प्रतिशत और शहरी महिलाओं की 27.3 प्रतिशत है।


श्रम के क्षेत्र में कुल महिलाओं की हिस्सेदारी 25.7 प्रतिशत है, जिसमें ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी 31 और शहरी महिलाओं की करीब 11.6 प्रतिशत है। 85 प्रतिशत कामगार ग्रामीण महिलाएं या तो निरक्षर हैं या प्राथिमक शिक्षा ही ले सकी हैं । ये आंकड़े ग्रामीण पृष्ठभूमि की महिलाओं के बारे में एक नजरिया तैयार करने के लिए काफी है। जिससे एक आम धारणा यह भी बनती है कि भारतीय समाज की विकास प्रक्रिया और श्रम में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण है। जबकि आकाशवाणी जैसे संचार माध्यम में उनकी आवाज अनसुनी कर दी जाती है। सर्वे के अनुसार कभी किसी ग्रामीण महिला को आकाशवाणी के कार्यक्रमों में बातचीत के लिए नहीं बुलाया जाता। यह सर्वे बताता है कि आकाशवाणी से एक वर्ष के दौरान 527 कार्यक्रम प्रसारित किए गए और इनमें महिलाओं पर केवल 8 कार्यक्रम प्रसारित हुए। इस तरह से आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण केंद्र से वर्षभर के दौरान प्रसारित हुए कुल कार्यक्रमों में महिलाओं की हिस्सेदारी 1.52 प्रतिशत रही। आधी-आबादी को आकाशवाणी के कार्यक्रमों में इतनी कम हिस्सेदारी आम श्रोता या नागरिक के लिए हैरानी वाली बात हो सकती है लेकिन आकाशवाणी की संचालक संस्था प्रसार भारती के लिए यह चौंकाने वाली बात नहीं है। प्रसार भारती की वार्षिक रिपोर्ट देखे तो उसमें भी ये साफ-साफ दर्ज है कि प्राइमरी चैनल और स्थानीय प्रसारण केंद्र से महिलाओं पर केंद्रित केवल क्रमशः 2.1 और 1.2 प्रतिशत कार्यक्रम ही पेश किए गए।

सर्वे के अनुसार आकाशवाणी पर समय-समय पर बातचीत के लिए बुलाए जाने वाले विशेषज्ञों में भी घोर लैंगिक असमानता है। आकाशवाणी के हिंदी एकांश ने वर्ष 2011 के दौरान विभिन्न विषयों पर बातचीत के लिए 244 लोगों को बुलाया जिसमें केवल 27 महिलाएं थीं। बहरहाल आकाशवाणी में थोड़ी बहुत जो महिलाएं दिखती भी हैं तो वह शहरी पृष्ठभूमि की हैं। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर होने वाली बातचीत में ग्रामीण पृष्ठभूमि की महिलाओं की सुरक्षा को नजरअंदाज कर शहरी महिलाओं को सुरक्षा की समस्या पर केंद्रित रहा।

आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण केंद्र के हिंदी एकांश में वर्ष 2011 के दौरान बुलाए गए विशेषज्ञों का ब्यौरा

क्रम
कार्यक्रम में बुलाए गए विशेषज्ञ
संख्या
प्रतिशत
1.
पुरुष
217
88.93
2.
महिला
27
11.06

कुल
244
100
(स्रोत सूचना के अधिकार के जरिए मिली जानकारी पर आधारित)


विशेषज्ञ के तौर पर कार्यक्रमों में बुलाई गई महिलाएं पूरी तरह से शहरी पृष्ठभूमि की पढ़ी-लिखी, नौकरी पेशे से संबंधित थी। जिन 27 महिलाओं को आकाशवाणी ने बुलाया उसमें ग्रामीण पृष्ठभूमि की कोई महिला शामिल नहीं है। (देखें तालिका)

आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण केंद्र में वर्ष 2011 के दौरान बुलाए गए विशेषज्ञों में शामिल महिलाओं का ब्यौरा
क्रम
महिला विशेषज्ञ
पेशा
1.
डॉ राखी मेहरा
चिकित्सक
2.
अदिति टंडन
पत्रकार
3.
सविता देवी
पत्रकार
4.
डॉ अर्चना सिंह
एकडमिशियन
5.
अन्नपूर्णा झा
वरिष्ठ पत्रकार
6.
नलनी
पर्सनॉल्टी एक्सपर्ट
7.
डॉ लवलीन यडानी
चिकित्सक
8.
रचना पंडित
प्रिंसिपल, डीपीएस
9.
प्रो. सुशीला रामास्वामी
शिक्षक दिल्ली विश्वविद्यालय
10.
सुमन नलवा
डीसीपी दिल्ली पुलिस
11.
शोभना नारायण
नृत्यांगना
12.
विदुषी चतुर्वेदी
महिला कार्यकर्ता, लेखिका
13.
जयती घोष
-
14.
अदिति फडनीस
पत्रकार
15.
मोनिका चंसोरिया
-
16.
उमा शर्मा
-
17.
वर्षा जोशी
जनगणना निदेशक दिल्ली
18.
बरखा सिंह
अध्यक्ष महिला आयोग, दिल्ली
19.
अंजू भल्ला
निदेशक, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय
20.
डॉ. रंजना कुमारी
निदेशक, सेंटर फॉर सोशल रिसर्च
21.
डॉ. ऋतु प्रिया
कम्युनिटी मेडिसीन जेएनयू
22.
प्रो. सविता पांडे
जेएनयू
23.
वीणा सीकरी
पूर्व राजनयिक
24.
अनीता सेतिया
उपनिदेशक, शिक्षा विभाग
25.
अंकिता गांधी
जन संसाधन अनुसंधान संस्थान
26.
सुधा सुंदर रमण
महासचिव, एडवा
27.
गार्गी परसाई
पत्रकार
(स्रोत सूचना के अधिकार के जरिए मिली जानकारी पर आधारित)

महिलाओं के साथ भेदभाव के साथ ही यह बात भी उठती है कि महिलाओं की सत्ता संस्थानों में हिस्सेदारी कितनी है। आकाशवाणी को प्रसार भारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी दूरदर्शन के मुकाबले बड़ा संगठन मानते हैं, लेकिन वहां क श्रेणी के पदों पर केवल 14 प्रतिशत महिलाएं है, जबकि दूरदर्शन में 25 प्रतिशत है।

मीडिया स्टडीज ग्रुप के पूर्व में आकाशवाणी पर ही किए गए सर्वे में दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले भेदभावपूर्ण व्यवहार की हकीकत को उजागर किया था। मसलन कि ऑल इंडिया रेडियो ने वर्ष 2011 के दौरान अनुसूचित जाति के मुद्दे पर सिर्फ एक कार्यक्रम सात नवंबर, 2011 को सरकारी नौकरियों में बढ़ती दलित आदिवासी अधिकारियों की संख्या को प्रस्तुत किया गया। हालांकि इसे केवल अनुसूचित जाति का मुद्दा कहना भी ठीक नहीं होगा क्योंकि इसके साथ आदिवासी शब्द भी जुड़ा हुआ है जिनकी जनसंख्या आठ फीसदी से ऊपर है। जबकि, देश की कुल आबादी में अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी 15 फीसदी से ज्यादा है। इसी तरह आकाशवाणी के कार्यक्रम तैयार करने वालों को आदिवासी सवाल नहीं सुझे या उसे समझा नहीं गया, जबकि यह समाज देश में सबसे संकटग्रस्त समाज है जो अपने अस्तित्व पर चौतरफा हमले का सामना कर रहा है। आकाशवाणी ने आदिवासी समस्या को लेकर कोई कार्यक्रम प्रसारित नहीं किए। वहीं देश में पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग (ओबीसी) की आबादी 27 फीसदी बताई जाती है और उस समाज के लिए भी सालभर में कोई कार्यक्रम प्रस्तुत नहीं किया गया।

सार्वजनिक क्षेत्र का लोक प्रसारक होने के नाते उसके राष्ट्रीय कार्यक्रमों का स्वरूप लोकतांत्रिक होना चाहिए। लेकिन कार्यक्रमों का विषय चयन और उसके लिए आमंत्रित मेहमानों की सूची लोक प्रसारक के लोकातांत्रिक होने पर सीधा सवाल खड़ा करते हैं, और सर्वे से स्पष्ट होता है कि अपने लोकतांत्रिक होने की घोषणा की आकाशवाणी खुद ही उल्लंघन कर रही है। प्रसार भारती अधिनियम (1990) में आकाशवाणी के उद्देश्यों में महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और समाज के अन्य निर्बल वर्ग के लोगों के हितों की रक्षा करने के लिए विशेष उपाय संबंधित मामलों में जागरूकता उत्पन्न करने को खास तौर से जगह दी गई है। लेकिन आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण केंद्र से प्रसारित हुए कार्यक्रमों का अध्ययन यह दिखाता है कि हकीकत में महिलाएं और खासकर ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं आकाशवाणी के दायरे से लगभग बाहर हैं और साथ ही दलित, पिछड़े, आदिवासियों को भी पर्याप्त जगह नहीं दी गई।

(मीडिया स्टडीज ग्रुप के सर्वे पर आधारित रिपोर्ट)

संजय कुमार, आईआईएमसी से प्रशिक्षित पत्रकार हैं। 
दैनिक 'सी एक्सप्रेस' में काम करने के बाद 
फिलहाल मीडिया शोध जर्नल जन मीडिया/मास मीडिया से जुड़े हैं। 
संपर्क snjiimc2011@gmail.com

बुधवार, 8 मई 2013

मीडिया में सुधार के लिए शोध जरुरी


          
यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट-2013 में खुलासा किया है कि भारत भले ही उभरती हुई अर्थव्यवस्था हो, लेकिन शोध के क्षेत्र में पाकिस्तान से भी पीछे है। जबकि भारत में शोध-कार्यों पर जीडीपी का 0.8 फीसदी खर्च किया जाता है, जो कि पाकिस्तान के खर्च से कहीं ज्यादा है। इससे एक बार फिर यह बात साफ हो जाती है कि विकास दर तो बढ़ रही है, लेकिन शोध कार्यों में हमारी स्थिति बेहतर नहीं है। मीडिया के क्षेत्र में तो शोध-कार्यों की स्थिति बदत्तर है।

 मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन मीडिया के चरित्र में आ रहे बदलाव के साथ  मीडिया में कई तरह की समस्याएं भी उभर कर सामने आई है। शोध कार्य ही एक मात्र जरिया है जिससे इन समस्याओं को समझने और उसे दूर करने के बारे में ठोस ढंग से बातचीत की जा सकती है। इस वजह से मीडिया के क्षेत्र में शोध का महत्व और भी बढ़ जाता है। समाज में शोध के महत्व को समझते हुए ही राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भी देश के विकास के लिए शोध-कार्यों को बढ़ावा देने की बात कही है।

मीडिया के क्षेत्र में छात्रों के शोध केवल डिग्री हासिल करने के उद्देश्य तक सिमट कर रह जाते है। उन शोधों से कुछ नया निकल कर नहीं आता है, कई बार एक ही प्रकार के शोध से विश्वविद्यलयों के पुस्तकालय भरे हुए हैं। एक तरह के शोधों में फर्क केवल शोध-शीर्षक भर का होता है। इससे जिस युवा अवस्था में विद्यार्थियों के पास सबसे उन्नत किस्म की उर्जा होती है, इस तरह के शोध करवाकर उनके समय और सार्वजनिक पैसों की बर्बादी की जाती है। इन शोध-कार्यों की न तो समाज में कोई उपयोगिता है। अभी तक मीडिया के क्षेत्र में अंग्रेजी में भले ही कुछ शोध मिल भी जाए, लेकिन हिंदी समेत भारतीय भाषाओं में बेहतर शोध मिलना मुश्किल है।

शोध संस्कृति को विकसित करने के उद्देश्य से मीडिया स्टडीज ग्रुप ने हाल के वर्षों में अपनी सक्रियता दिखाई है। बिना किसी संस्थान के सहायता के भी समाज के लिए उपयोगी शोध कैसे किए जा सकते हैं यह इस ग्रुप ने करके दिखाया है। एक वर्ष से ज्यादा समय हो गया जब ग्रुप ने हिन्दी में जन मीडिया और अंग्रेजी में मास मीडिया रिसर्च जर्नल भी प्रकाशित करने शुरू कर दिए है। इसका नारा है हमारा समाज हमारा शोध। इस समूह ने 2006 में मीडियाकर्मियों की सामाजिक पृष्ठभूमि का अध्ययन कर मीडिया में एक नई बहस को जन्म दिया, यह बहस आज भी चल रही है। इसके बाद मीडिया में देश भर में जिले स्तर पर मीडिया में सक्रिय महिलाओं को लेकर किए गए सर्वे ने तो मीडिया में महिलाओं की भागीदारी की वास्तविकता को सामने लाकर रख दिया। मीडिया में राज्यों और देश की राजधानी को छोड़ दें, तो जिले स्तर पर आधी आबादी का लगभग दो प्रतिशत के आसपास प्रतिनिधित्व है।

वहीं, एक सर्वे के मुताबिक प्रशिक्षित पत्रकारों में से एक चौथाई से ज्यादा पत्रकार पत्रकारिता को छोड़ चुके है, जो कि एक नये तरह के सवाल को सामने लाता है। जब प्रतिष्ठित संस्थानों के वेतनभोगी पत्रकारों की यह हालत है, तो अन्य पत्रकारों की स्थिति का भी अंदाज लगाया जा सकता है। पत्रकारों को केवल पत्रकारिता में केवल पैसे की ही जरूरत नहीं रहती है वह समाज में परिवर्तन में भी अपनी भूमिका इसके जरिये सुनिश्चत करने की कोशिश करता है। इस सर्वे से पत्रकारों और पत्रकारिता के संबंधों की स्थिति पर विचार-विमर्श शुरू हुआ। इसी तरह टीवी चैनलों पर होने वाली बहसों के अध्ययन में यह बात सामने आई कि कैसे चंद लोगों का ही बहसों पर एकाधिकार बना हुआ है। आपातकाल के दिनों में जिस तरह से एक छोटे से समूह का दूरदर्शन के स्टुडियों में कब्जा रहा है, उसी तरह से निजी चैनलों में भी छोटे से समूह का ही कब्जा है।

इसी तरह से डीडी उर्दू का अध्ययन, आकाशवाणीः बहुजन हिताय, सुखाय का अध्ययन, टीआरपी और निर्मल बाबा पर अध्ययन जैसे कई शोध कार्य मीडिया स्टडीज ग्रुप ने किए है। यह समूह शोध और अध्ययन के जरिए समाज को नई दिशा देने के लिए प्रयास करता रहता है।

आज जब प्रोफेनशल मीडिया अपने उद्देश्य से भटक गया और पत्रकारिता के मानकों का उल्लंघन कर रहा है। पेड न्यूज और क्रास मीडिया आनरशिप जैसी समस्या भी सामने आ रही है। इन समस्याओं से निपटने के लिए और मीडिया में सुधार के लिए शोध-कार्यों को बढ़ावा देना जरूरी है। शोध और अध्ययन के जरिए हमें मीडिया को समझने में आसानी होगी। 

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

बलात्कार की घटनाओं पर शर्म करें या बयानों पर



हरियाणा में  34 दिनों में 19 बलात्कार की घटनाएं हुई। इन घटनाओं ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि महिलाएं या लड़कियां कितनी सुरक्षित है। तो वहीं बलात्कार की घटनाओं पर आए बयानों से महिलाओं को लेकर हमारे समाज की सोच का भी पता चलता है।

कुछ माह पहले दिल्ली में हुई बलात्कार की एक घटना में जब पीड़िता की पुलिस ने पहचान उजागर की थी, तब तहलका ने अपने अप्रैल के अंक में बलात्कार के मामले में 30 पुलिसकर्मियों बात-चीत की, जिसमें से 17 पुलिसकर्मियों ने महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह और बलात्कार की शिकार लड़कियों के प्रति असंवदेनशीलता दिखाई। उस तहकीकत से एक बात ओर सामने आई थी कि लड़की को हमेशा ही दोषी ठहराने की कोशिश की जाती है।

 नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो(एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक पिछले सात साल में हरियाणा में बलात्कार की वारदातें दोगुनी  हुई हैं। 2004 में 386 बलात्कार दर्ज करने वाले राज्य में 2011 में बलात्कार की 733 घटनाएं सामने आई है।

अब जब हरियाणा में बलात्कार की घटनाएं थम नहीं रही है। इन घटनाओं पर आए बयानों पर गौर करें। सोनिया गांधी ने कहा कि रेप तो पूरे देश में हो रहे हैं। तो वहीं कांगेस नेता धर्मवीर गोयत ने बलात्कार के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराया है। दूसरी ओर खाप पंचायतें रेप की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए लड़कियों की शादी की उम्र को 18 से 16 साल करने की सलाह दे रही है, तो एक खाप नेता जितेंद्र छत्तर सिनेमा, संस्कृति और फास्टफूड को जिम्मेदार ठहरा रहे है। इन बयानों में कहीं भी सही मायने बलात्कार की घटनाओं को रोकने के लिए कोई अहम कदम उठाने की बात नहीं की गई है। जो खाप पंचायतं स्वयं को गांव और परंपरा का रखवाला बताती है या फिर वह नेता जिन्हें जनता चुनकर भेजती है, वह ऐसे बयान देंगे तो उनसे क्या उम्मीद की जा सकती हैं। इन बयानों में लड़की को ही दोषी ठहराया गया है। इसे सिर्फ पितृसत्तात्मक और सामंतवादी सोच का पता चलता है।

एक अन्य तर्क यह भी दिया जाता है कि लड़कियां भड़काऊ कपड़े पहनती है और मेकअप करती है, जिससे उनके साथ रेप होता है। ऐसे बेतुके तर्क देने के बजाए हमें मानसिकता को बदलना चाहिए। हम आधुनिक तो बन गए, लेकिन हम आज भी अपनी सोच को आधुनिक नहीं बना पाए।

 कैबिनेट ने जहां महिलाओं को अश्लील एसएमएस, एमएमएस और ई-मेल भेजने वाले कानून में संशोधन करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इसके तहत ऐसा करने वालों को पहली बार दो साल की कैद और 50 हजार का जुर्माना, दोबारा ऐसा करने वालों को सात साल सजा और एक से पांच लाख तक के जुर्माने की व्यवस्था की है। इसे भले ही महिलाओं को कुछ राहत मिले, लेकिन नेताओं के बलात्कार की घटनाओं पर आए बयानों से तो महिलाओं में असुरक्षा की भावना ही पैदा होगी। नेताओं को ऐसी बयानबाजी के बजाए बलात्कार की घटनाओं को रोकने के लिए कदम उठाने चाहिए। कानूनों को अमल में लाया जाना चाहिए। हमारे पुलिस तंत्र को भी इन घटनाओं में संवेदनशीलता दिखाने की आवश्यकता है।

सोमवार, 24 सितंबर 2012

हिन्दी की बढ़ती लोकप्रियता और हिन्दी का गिरता स्तर




एक बार फिर हिन्दी दिवस पर सैकड़ों आयोजन हुए। जिनमें हिन्दी के बढ़ते महत्व पर व्याख्यान दिए गए, तो कहीं हिन्दी की गिरावट पर चर्चा हुई। इसके बाद हम फिर पूरे साल हिन्दी की उपेक्षा करने लगेंगे ।

    हम अपनी भाषा की उपेक्षा क्यों करने लग जाते हैं, जबकि पश्चिमी देशों में हिन्दी पढ़ाए जाने पर हमें गर्व होता है। यह हिन्दी के लिए अच्छा है कि आज दुनिया के करीब 115 शिक्षण संस्थानों में  हिन्दी का अध्ययन हो रहा है। अमेरिका, जर्मनी में भी हिन्दी को पढ़ाया जा रहा है। हमें अन्य देशों से सिखना चाहिए कि कैसे वह अपनी भाषा के साथ ही अन्य भाषा को भी अपनाने की कोशिश करते हैं।
     एक ओर हिन्दी लोकप्रिय हो रही है, लेकिन वहीं हिन्दी का स्तर भी गिरता जा रहा है। हम हिन्दी की स्थिति को जानने के लिए अखबारों, न्यूज चैनलों का सहारा लेते हैं। आज हिन्दी अखबारों के भले ही करोड़ो पाठक है। जिससे यह कहा जाता है कि हिन्दी फल-फूल रही है, जबकि हिन्दी की स्थिति अच्छी नहीं है, क्योंकि आज अखबारों में हिंग्लिश शब्दों का प्रचलन बढ़ रहा है। वहीं हिन्दी अखबारों में से आज आई-नेक्सट जैसे समाचार पत्र भी निकल कर रहे हैं। जो न तो पूरी तरह से  हिन्दी और न ही पूरी तरह से अंग्रेजी है, जिसे युवा वर्ग काफी पसंद कर रहा है। हिन्दी अखबारों में कुछ अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग हो तो अच्छा है, लेकिन जब  हिन्दी के आसान शब्दों के स्थान पर भी अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग किया जाए, तो स्थिति चिंताजनक हो जाती है।
     यह भी कहा जाता है कि लोग मीडिया से अपनी भाषा बनाते हैं। ऐसे में जब हिन्दी के ही बड़े अखबार हिन्दी के एक ही शब्द को अलग-अलग तरीके से लिख रहे हो- जैसे- कोई अखबार सीबीआई को सीबीआइ, बैलेस्टिक को बलिस्टिक, टॉवर को टावर, कॉलोनी को कोलोनी लिख रहे हैं। ऐसे में जब पाठक मीडिया से अपनी भाषा तय करता है, तो पाठक सही गलत के फेर में उलझ जाता है। इन शब्दों को आज चाहे स्टाइल शीट के बहाने प्रयोग किया जा रहा है या फिर हिन्दी की मानक के शब्दों को भुलाने की कोशिश हो रही है।
     हिन्दी सिनेमा ने जहां हिन्दी के प्रसार में अहम भूमिका निभाई है। सिनेमा ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी हिन्दी को लोकप्रियता दिलाई है, लेकिन आज हिन्दी सिनेमा भी अंग्रेजी की गिरफ्त में आ गया है। आज हमारी फिल्म तो  हिन्दी है, लेकिन नाम अंग्रेजी है- जैसे वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई, गैंग्स आॅफ वासेपुर, देल्ही बेली, नॉटी एट फोर्टी है। ऐसे में क्या कहा जाए कि अब  हिन्दी मीडिया की तरह हिन्दी सिनेमा में भी अंग्रेजी शब्दों या हिंग्लिश भाषा का चलन बढ़ रहा है। इसके बाद कहीं हिन्दी के बजाए हिंग्लिश भाषा में फिल्में तो नहीं आने लगेंगी।
     अब बात करें स्कूली शिक्षा की तो इस बार यूपी बोर्ड में हिन्दी में सवा तीन लाख बच्चे फेल हो जाते हैं। यह चिंतनीय विषय है, क्योंकि इन बच्चों से ही  हिन्दी का भविष्य तय होगा। हिंदी में इतने बच्चों के फेल होने पर मीडिया में इस पर कोई खास चर्चा नहीं हुई।

   हिन्दी के गिरते स्तर को सुधारने की जरुरत है। हम जिस तरह अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने पर जोर देते हैं, उसी तरह हमें अपने बच्चों को  हिन्दी पढ़ाने पर भी जोर देना चाहिए। सरकार द्वारा भी प्राथमिक शिक्षा के माध्यम के तौर हिन्दी को बनाए रखना चाहिए। हमारे मीडिया को चाहिए कि वह भी हिन्दी की लोकप्रियता के साथ ही उसके स्तर पर भी ध्यान दें, वरना आने वाले समय आई-नेक्सट जैसे अखबारों की भरमार होगी।